
भारतीय क्रिकेट के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है। जम्मू-कश्मीर ने रणजी ट्रॉफी का खिताब जीतकर 67 साल पुराना सूखा खत्म कर दिया। फाइनल में आठ बार की चैंपियन कर्नाटक के खिलाफ ड्रॉ खेलते हुए पहली पारी की बढ़त के दम पर ट्रॉफी थाम ली। 1959 में रणजी में कदम रखने वाली यह टीम लंबे समय तक हार के मुंह में रही।
शुरुआती सालों में बड़े दिग्गजों के लिए जेकेए को हराना आसान था। सुविधाओं का अभाव, स्टार खिलाड़ियों की कमी—90 का दशक तो हार की पर्याय बन गया।
फिर आई बिशन सिंह बेदी की कोचिंग। उन्होंने ड्रेसिंग रूम में जज्बा भरा, लड़ने की कला सिखाई। 2013-14 में क्वार्टरफाइनल पहुंचकर टीम को नई उमंग मिली।
2014-15 में परवेज रसूल की कप्तानी में मुंबई जैसी दिग्गज को हराया, जो मील का पत्थर साबित हुआ। 2019 के बाद प्रशासनिक बदलावों से चयन पारदर्शी हुआ, फंडिंग बढ़ी, नए ट्रेनिंग सेंटर बने, बीसीसीआई से सीधा लाभ मिला।
मिथुन मन्हास ने जेकेए की कमान संभाली, अजय शर्मा को कोच बनाया। 2022 से शर्मा ने टीम में आत्मविश्वास का जादू चलाया। कप्तान पारस डोगरा ने 2025-26 में इतिहास रचा।
औकिब नबी डार ने 10 मैचों में 60 विकेट झटके, शुभम पुंडीर और डोगरा ने बल्ले से कमाल दिखाया। यह जीत जेकेए के उज्ज्वल भविष्य की शुरुआत है।