
बवासीर यानी पाइल्स एक आम लेकिन बेहद कष्टदायक समस्या है। गुदा क्षेत्र में सूजन, दर्द, मल में खून और कभी-कभी बाहर निकलना जैसी परेशानियां इसे और जटिल बनाती हैं। गलत आहार, कब्ज, तनाव और लंबे समय तक बैठना इसके प्रमुख कारण हैं। आयुर्वेद इसकी जड़ को संभालते हुए प्राकृतिक उपचार प्रदान करता है।
आयुर्वेद में त्रिदोष संतुलन ही चिकित्सा का आधार है। वात-पित्त-कफ के असंतुलन से यह रोग होता है। इसलिए आहार-विहार से इनका साम्य आवश्यक है। सबसे पहले भोजन में बदलाव लाएं। तला-भुना, मसालेदार व्यंजन त्यागें। हरी मूंग, साबुत अनाज, दालें और ढेर सारा पानी अपनाएं। इससे कब्ज दूर रहेगा।
त्रिफला आंतों की शुद्धि के लिए उत्तम है। 3-5 ग्राम पाउडर आमले के छिलके संग गुनगुने पानी से लें। यह विषाक्त पदार्थ निकालकर बवासीर में राहत देता है।
गुलकंद पाचन सुधारता और सूजन घटाता है। प्रतिदिन 1-2 चम्मच लें। खूनी बवासीर में लाजवंती के पत्तों का रस रक्त रोकता है। ताजा निकालकर पिएं।
सिट्ज बाथ के लिए त्रिफला, पिप्पली, गूलर की छाल उबालें। गुनगुने पानी में 15 मिनट बैठें। नारियल तेल से मालिश करें। ये उपाय दर्द निवारक हैं।
किसी भी उपचार से पूर्व वैद्य से परामर्श लें। नियमितता से बवासीर पर विजय पाएं।