
हिंदी सिनेमा के संगीत जगत में रवींद्र जैन का नाम अमर है। उनकी जिंदगी संघर्षों भरी रही, लेकिन सबसे बड़ी चाहत थी राज कपूर के साथ काम करने की। सालों तक उन्होंने कोशिश की, फोन किए, मुलाकातें कीं और अपना टैलेंट दिखाया। राज कपूर हमेशा कहते, ‘समय आएगा, मौका मिलेगा। बस मेहनत करते रहो।’
अलीगढ़ में 28 फरवरी 1944 को जन्मे रवींद्र जैन को पिता ने घर पर संगीत सिखाया। पांच रेडियो स्टेशनों ने ऑडिशन में नकारा, लेकिन राधे श्याम झुनझुनवाला ने 1969 में मुंबई लाकर फिल्मी सफर शुरू करवाया।
14 जनवरी 1971 को ‘लोरी’ में मोहम्मद रफी से पहला गीत रिकॉर्ड किया-‘ये सिलसिला है प्यार का चलता ही रहेगा।’ लता मंगेशकर से चार और लता-आशा डुएट गवाया, लेकिन फिल्म अधर में लटक गई। पहली रिलीज ‘कांच और हीरा’ (1972) में रफी का ‘नजर आती नहीं मंजिल’ सराहा गया।
फिर आईं ‘सौदागर’, ‘चोर मचाए शोर’, ‘चित चोर’, ‘तपस्या’, ‘हम नहीं सुधरेंगे’ जैसी फिल्में। पुणे में राज कपूर की जन्मदिन पार्टी में ‘सुन साहिबा सुन’ सुनाते ही कपूर ने कहा, ‘तुम्हीं ‘राम तेरी गंगा मैली’ करोगे।’ 1985 की यह फिल्म हिट हुई, गानों ने धूम मचाई और रवींद्र को फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला।
यह किस्सा बताता है कि सच्ची मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती।