
बेंगलुरु में शुक्रवार को वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री ए नारायणस्वामी ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि 35 वर्षों से आंतरिक आरक्षण की मांग कर रहे मदिगा समुदाय के साथ मुख्यमंत्री ने घोर विश्वासघात किया है। यह धोखा केवल मदिगा तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे राज्य के दलितों को गुमराह करने वाला है।
नारायणस्वामी ने कहा कि सरकार ने 101 जातियों को भ्रमित किया और नौकरी की आस लगाए युवाओं को गलत आश्वासन दिए। तमिलनाडु ने अनुच्छेद 9 के तहत 69 प्रतिशत आरक्षण लागू कर वंचितों को न्याय दिया, जबकि कर्नाटक में हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट में प्रभावी पैरवी की इच्छाशक्ति का अभाव है।
सार्वजनिक धन से सर्वेक्षण और आयोगों पर खर्च कर रिपोर्टों को ठंडे बस्ते में डालना—जैसे न्यायमूर्ति सदाशिव, मधुस्वामी और नागमोहन दास की रिपोर्टें—किसके हित में है? सुप्रीम कोर्ट के फैसले के एक साल बाद भी चर्चा न होना सरकार की नाकामी है। विधानसभा से विधेयक पास कर राज्यपाल को भेजा गया, लेकिन मामला लटका हुआ है।
उन्होंने मांग की कि यदि सीएम, दलित मंत्री और 54 एससी/एसटी विधायक दलित हितों के प्रति सच्चे हैं, तो इस्तीफा दें। कैबिनेट में दलित मंत्री चुप क्यों हैं? न बोल सकें तो पद क्यों संभाले? आंदोलन की घोषणा कर सीएम से इस्तीफे की मांग की।
राज्य में 2.8 लाख सरकारी पद खाली हैं, युवा प्रदर्शन कर रहे हैं। कैबिनेट का पुरानी आरक्षण व्यवस्था बहाल करने का फैसला दलितों-युवाओं को ठगने वाला है। छत्तीसगढ़ (58%) और मध्य प्रदेश (57%) ने 50% सीमा लांघी, कर्नाटक अदालत में कमजोर पड़ा।
कांग्रेस ने सत्ता पूर्व मदिगा को आंतरिक आरक्षण का वचन दिया था। सिद्धारमैया खुद को सामाजिक न्याय का पैरोकार बताकर भ्रम फैला रहे। 1 अगस्त 2024 के सुप्रीम कोर्ट फैसले ने आंतरिक आरक्षण का मार्ग प्रशस्त किया, जो अंबेडकर संविधान की भावना है।