
तमिलनाडु के सलेम में शुक्रवार को एक ऐतिहासिक क्षण देखने को मिला जब भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हैंडलूम टेक्नोलॉजी (आईआईएचटी) के आधुनिक एकेडमिक ब्लॉक का उद्घाटन किया। इस दौरान उन्होंने संस्थान की उस भूमिका पर प्रकाश डाला जो पारंपरिक बुनाई कला को नई तकनीकों से लैस कर विश्व पटल पर मजबूत कर रही है।
सलेम शहर के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए उपराष्ट्रपति ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता सेनानी सी. राजगोपालाचारी से इसके गहरे संबंध का जिक्र किया। राजाजी ने यहीं से अपना विधि जीवन आरंभ किया था और सलेम नगर निगम के अध्यक्ष भी रहे। राष्ट्रपति भवन में हाल ही उनके नए बस्ट का अनावरण इसका जीता-जागता प्रमाण है।
आईआईएचटी सलेम पारंपरिक बुनकरों के ज्ञान को आधुनिक टेक्सटाइल विज्ञान से जोड़कर उत्पादन क्षमता बढ़ा रहा है। गुणवत्ता सुधारते हुए यह हाथ के बुने वस्त्रों की मौलिकता को बरकरार रखे हुए बाजार की जरूरतों को पूरा कर रहा है। भारत की हैंडलूम विविधता का जिक्र करते हुए वाराणसी सिल्क, बंगाल जामदानी, असम मूगा, कश्मीर कानी, आंध्र की वेंकटगिरी-मंगलगिरी बुनाई और मध्यप्रदेश की माहेश्वरी-चंदेरी साड़ियों का उल्लेख किया।
तमिलनाडु की बुनाई कला पर फोकस करते हुए चेट्टिनाडु कंडांगी, कांचीपुरम सिल्क, अरानी, थिरुबुवनम सिल्क, चेन्नीमलाई कंबल, नागरकोइल वेश्ती और मदुरै सुंगुडी का विशेष उल्लेख हुआ। इनसे न केवल सांस्कृतिक धरोहर मजबूत होती है बल्कि आर्थिक उन्नति भी सुनिश्चित होती है।
भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते का जिक्र करते हुए कहा कि इससे टेक्सटाइल क्षेत्र की वैश्विक क्षमता बढ़ेगी। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सरकारी प्रयासों से सलेम से निर्यात में उछाल आएगा और अंबुर से चमड़ा निर्यात तेज होगा।
आईआईएचटी को हैंडलूम क्षेत्र को रचनात्मक उद्योग में तब्दील करने का आह्वान किया गया, जो मूल्य वृद्धि करे, कारीगरों का सम्मान बढ़ाए और बुनकरों के लिए स्थायी रोजगार दे। प्रदर्शनी में देशभर के उत्पाद दिखाए गए, जिसमें केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह और राज्य पर्यटन मंत्री आर राजेंद्रन उपस्थित थे। यह कदम हैंडलूम विरासत को संरक्षित कर लाखों परिवारों की आजीविका मजबूत करेगा।