
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया है। इस्लामाबाद ने तालिबान पर टीटीपी उग्रवादियों को पनाह देने का आरोप लगाते हुए भारत को भी इसमें शामिल कर लिया। काबुल और कंधार पर पाकिस्तानी हवाई हमलों के बाद अफगानिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की, जिससे स्थिति युद्ध जैसी हो गई।
पाकिस्तान ने दावा किया कि उसके हमलों में 70 उग्रवादी मारे गए, लेकिन अफगानिस्तान ने इसे झूठ बताते हुए महिलाओं-बच्चों समेत नागरिकों की मौत का दावा किया। बिना सबूत के तालिबान पर टीटीपी संरक्षण का इल्जाम लगाया गया।
अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद तालिबान सत्ता में आया तो पाकिस्तान ने बधाई दी थी, उम्मीद करते हुए कि अफगानिस्तान उसके इशारे पर चलेगा। लेकिन तालिबान ने पाकिस्तान के दबाव को ठुकरा दिया। डूरंड लाइन पर बम धमाके, हवाई हमले और झड़पें बढ़ गईं।
अपनी गलतियों को छिपाने के लिए पाकिस्तान ने भारत पर तालिबान को समर्थन देने का आरोप लगाया। भारत ने साफ कहा कि पाकिस्तान अपनी समस्याओं को दूसरों पर थोपता है। भारत ने हमेशा अफगानिस्तान की मदद की है—भूकंप के बाद 15 टन भोजन और दवाएं भेजीं।
पाकिस्तान को भारत-अफगान दोस्ती चुभती है। वह बेबुनियाद आरोप लगाता रहता है कि भारत टीटीपी को फंड करता है। तालिबान और भारत दोनों ने इसे खारिज किया। अफगान विदेश मंत्री की भारत यात्रा के बाद दूतावास दोबारा खुलने का फैसला हुआ।
विशेषज्ञों का मानना है कि आर्थिक संकट और टीटीपी खतरे के बीच पाकिस्तान जनता का ध्यान भटकाने के लिए भारत को निशाना बना रहा है। यह रणनीति सरकार को कुछ राहत दे सकती है, लेकिन क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ाएगी।