
प्रकाश झा का नाम आज बॉलीवुड में सामाजिक मुद्दों पर गंभीर फिल्में बनाने वाले निर्देशक के रूप में लिया जाता है। लेकिन उनका सफर एक छोटी सी डॉक्यूमेंट्री से शुरू हुआ था। ‘फेस आफ्टर द स्टॉर्म’ नामक यह फिल्म 1981 में बिहार के नालंदा में हुए सांप्रदायिक दंगों की कहानी बयां करती है। इस फिल्म ने न सिर्फ उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया, बल्कि पूरे करियर को नई दिशा दी।
फिल्म में झा ने हिंसा के मानवीय पहलुओं को उकेरा। स्थानीय लोगों से गहन बातचीत के जरिए उन्होंने दिखाया कि कैसे साधारण नागरिक गुस्से में आग लगाने लगते हैं। सामाजिक विषमताएं, आर्थिक तंगी और राजनीतिक साजिशें—ये सभी कारक हिंसा को जन्म देते हैं। फिल्म ने यह भी रेखांकित किया कि दंगों का कुप्रभाव समाज के हर तबके पर पड़ता है, चाहे वह गरीब हो या अमीर।
इस डॉक्यूमेंट्री को बनाने में झा को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। शुरुआती दौर में संसाधनों की कमी थी, फिर भी उन्होंने जोखिम उठाकर शूटिंग की। पहले चित्रकार बनने का सपना देखने वाले झा को फिल्मों में सामाजिक सच्चाइयों को दिखाने का मौका मिला, तो उन्होंने दोनों हाथों से लपका।
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिलने के बाद झा की पहचान बन गई। आलोचकों और दर्शकों ने उनकी मेहनत को सलाम किया। इसी सफलता ने उन्हें फीचर फिल्मों की दुनिया में धकेला। 1984 में आई ‘हिप हिप हुर्रे’ उनकी पहली फुललेंथ फिल्म थी। इसके बाद ‘परिणति’, ‘मृत्युदंड’, ‘गंगाजल’, ‘अपहरण’, ‘राजनीति’, ‘आरक्षण’, ‘चक्रव्यूह’, ‘सत्याग्रह’, ‘जय गंगाजल’ जैसी कई सशक्त फिल्में बनीं। ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ जैसी फिल्मों ने तो लीक तोड़ दी।
आज भी सक्रिय झा नए प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे हैं। उनकी कहानी साबित करती है कि एक छोटी शुरुआत भी बड़ा मुकाम दिला सकती है।