
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के अमर क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की पुण्यतिथि पर हम उनकी वीर गाथा को याद करते हैं। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में उन्होंने अपना प्रण निभाया – जिंदा पकड़े जाने के बजाय खुद को गोली मार ली।
1906 में मध्य प्रदेश के भाबरा में जन्मे आजाद का बचपन से ही विद्रोही स्वभाव था। पुलिस की क्रूरता के खिलाफ उन्होंने अंग्रेज अधिकारी पर पत्थर फेंका। मात्र 14 वर्ष की आयु में असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। गिरफ्तारी पर मजिस्ट्रेट को चुनौती दी – नाम आजाद, पिता स्वतंत्रता, ठिकाना जेल।
15 कोड़ों की सजा पर हर वार के साथ ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष। इसी घटना ने उन्हें चंद्रशेखर आजाद बना दिया। चौरी-चौरा के बाद गांधीजी के आंदोलन वापसी ने उन्हें सशस्त्र क्रांति की ओर मोड़ा।
भगत सिंह संग हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन। काकोरी कांड जैसी साहसिक कार्रवाइयों से अंग्रेजों को चुनौती। मुखबिर की गद्दारी से अल्फ्रेड पार्क में घेराबंदी।
बहादुरी से लड़ते हुए गोलियां खत्म होने पर स्वयं को गोली मार अंतिम सांस ली। आजाद का बलिदान स्वतंत्रता की लौ को हमेशा प्रज्वलित रखेगा। उनकी मूंछों का ताव आज भी युवाओं को प्रेरित करता है।