
हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर में मनमोहन देसाई का नाम बॉक्स ऑफिस पर राज करने का पर्याय बन गया। उनकी फिल्में एक्शन, ड्रामा, हास्य और पारिवारिक एकता का अनोखा संगम थीं। सिल्वर जंबली यानी 25 हफ्ते और गोल्डन जंबली यानी 50 हफ्ते थिएटर्स में धमाल मचाने का उनका रिकॉर्ड आज भी अमर है—लगातार सात सिल्वर और चार गोल्डन।
26 फरवरी 1937 को मुंबई में जन्मे मनमोहन के पिता कीकूभाई देसाई प्रोड्यूसर थे। मात्र चार साल की उम्र में पिता के निधन से परिवार कर्ज के बोझ तले दब गया। घर-जायदाद बिक गई, लेकिन इस संघर्ष ने उनकी फिल्मों को नई ऊंचाई दी, जहां बिछड़े परिवारों का मिलन मुख्य थीम बना।
बड़े भाई सुभाष के सहयोग से फिल्मी दुनिया में कदम रखा। असिस्टेंट डायरेक्टर से शुरूआत कर ‘छलिया’ (1960) से निर्देशन में डेब्यू किया। राज कपूर-नूतन की जोड़ी और ‘बाजे पायल छुन छुन’, ‘डम डम डिगा डिगा’ जैसे गीतों ने कमाल कर दिया।
1977 उनका स्वर्णिम वर्ष रहा। ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘धर्म वीर’, ‘चाचा भतीजा’ और ‘परवरिश’—चारों ब्लॉकबस्टर। ‘अमर अकबर एंथनी’ तो इतिहास रच गई, कई थिएटर्स में सिल्वर जंबली मना ली।
पत्नी के निधन से टूटे मनमोहन ने नंदा से सगाई की, मगर 1 मार्च 1994 को मुंबई के अपार्टमेंट की बालकनी से गिरकर उनका देहांत हो गया। उनकी फिल्में आज भी दर्शकों के दिलों में बसी हैं, जो मनोरंजन का बेमिसाल उदाहरण हैं।