
भारत के प्रमुख मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के महिलाओं से जुड़े नए कानून की कड़ी निंदा की है। अयोध्या और बरेली से उठी ये आवाजें बताती हैं कि इस्लाम के मूल सिद्धांतों से कितना बड़ा अंतर है तालिबान की कट्टर व्याख्या का।
अयोध्या विवाद के पक्षकार इकबाल अंसारी ने इसे ‘काले कानून’ करार देते हुए कहा कि जिन्हें कोई ठीक काम नहीं, वे व्यर्थ के नियम थोपते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि हिंसा कहीं भी अस्वीकार्य है। सभी के साथ न्याय हो और समाज में अच्छे संबंध बनें, तभी हिंसा दूर होगी। मौलाना सबको गले लगाने की बात करें, न कि हिंसा को बढ़ावा दें।
बरेली से ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के प्रमुख मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने भी तालिबान के पति-पत्नी और बच्चों पर मारपीट की अनुमति देने वाले हुक्मनामे को हिंसा पर आधारित बताया। उन्होंने कहा कि तालिबान हमेशा आतंकवादी चेहरा रहा है, जिसे हम कभी स्वीकार नहीं करते।
हालांकि तालिबान ने सत्ता संभालने के बाद भारत-विरोधी गतिविधियों से परहेज और विकास का वादा किया, लेकिन उनकी सख्तियां बरकरार हैं। ये भारतीय आलोचनाएं वैश्विक मुस्लिम विद्वानों के रुख को मजबूत करती हैं, जो शांति और मानव गरिमा को प्राथमिकता देते हैं। अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में ये आवाजें सुधार की मांग को बल देंगी।