
नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के बहुप्रतीक्षित ऋण ने पाकिस्तान को तात्कालिक आर्थिक ढहाव से बचा तो लिया है, लेकिन मंद विकास दर और आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता मध्यम अवधि में नई मुश्किलों की आहट दे रही है।
सितंबर 2024 में आईएमएफ ने 7 अरब डॉलर की विस्तारित निधि सुविधा को मंजूरी दी, जिसका लक्ष्य समग्र आर्थिक स्थिरता लाना और नीतिगत भरोसे को फिर से खड़ा करना था। अब तक इस योजना के तहत करीब 3.3 अरब डॉलर मिल चुके हैं। बाकी 3.7 अरब डॉलर 2027 तक छमाही किस्तों में मिलेंगे, बशर्ते समीक्षाएं सफल हों और शर्तें पूरी हों।
यह ढांचा नीतिगत कठोरता सुनिश्चित करने को है। व्यावहारिक रूप से यह खाड़ी देशों को अतिरिक्त मदद के लिए हरी झंडी भी है। बदले में पाक अधिकारियों ने राजस्व अनुशासन और सख्त मौद्रिक रुख अपनाने का वचन दिया। नतीजा? विकास की रफ्तार सुस्त।
2024 में वास्तविक जीडीपी में महज 2.4 प्रतिशत वृद्धि हुई, 2025 में करीब 3.5 प्रतिशत रहने का अनुमान। जनसंख्या वृद्धि सालाना लगभग 2 प्रतिशत होने से प्रति व्यक्ति आय में मामूली सुधार ही हुआ, जीवन स्तर पर असर नगण्य।
यह कमजोर पृष्ठभूमि सुधारों को चुनौतीपूर्ण बनाती है। आईएमएफ नीतियों पर ‘विकास-विरोधी’ होने का आरोप बढ़ रहा। ऊर्जा क्षेत्र सुधार के लिए बिजली दरें बढ़ाने से तात्कालिक महंगाई में 1 प्रतिशत की उछाल आ सकती है, जन समर्थन घटेगा।
1958 से 24वां यह कार्यक्रम पाक का रिकॉर्ड है। संकट में पालन, दबाव घटने पर ढील—पुरानी समस्याएं लौट आतीं। पुराने समझौते अल्पकालिक स्थिरता देते, लेकिन दीर्घकालिक बदलाव न लाए।
कुछ राजनीतिक धड़े जल्दी बाहर निकलने की बात कर रहे, लेकिन फंडिंग जरूरतें और 2029 तक चुनाव न होना अनुशासन बनाए रखने का मौका देता है। 2027 तक आईएमएफ नजर रखेगा, उसके बाद पुरानी आदतें लौट सकती हैं, खासकर विकास निराशाजनक रहे तो।