
उत्तराखंड की पवित्र धरती पर एक अनोखा मंदिर है जहां मूर्तियों के बजाय अस्थियों की पूजा होती है। कार्तिक स्वामी मंदिर त्याग और भक्ति का जीवंत प्रतीक है, जो भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय से जुड़ी पौराणिक घटना को संजोए हुए है।
रुद्रप्रयाग जिले के कनकचौरी गांव के निकट स्थित यह मंदिर रुद्रप्रयाग-पोखरी मार्ग से मात्र तीन किलोमीटर की मनोरम पैदल दूरी पर है। पहाड़ी शिखर पर बसा होने से ट्रेकिंग का आनंद मिलता है, जिसमें देवभूमि का स्वर्गीय नजारा चारों ओर बिखरा रहता है।
मंदिर में कोई स्थापित प्रतिमा नहीं, बल्कि प्राकृतिक शिला है जिसे कार्तिकेय की अस्थियां माना जाता है। कथा के अनुसार, गणेश से प्रतियोगिता में पराजित कार्तिकेय इन पहाड़ों पर आकर अपने माता-पिता शिव-पार्वती को प्रेम का प्रमाण देते हुए शरीर त्याग बैठे।
दो सौ वर्ष पुराना यह छोटा सा मंदिर भक्तों की आस्था से चमकता है। सावन और शिवरात्रि पर विशेष अनुष्ठान होते हैं। शाम की आरती में घंटियों की गूंज से पूरा परिवेश शिवमय हो जाता है।
साल भर खुला रहने वाला मंदिर बर्फीले मौसम में सतर्कता बरतने की सलाह देता है। दुर्गमता के बावजूद श्रद्धा रास्ते आसान कर देती है, जो इस धरोहर को अमर बनाती है।