
भारतीय सिनेमा के सुनहरे दौर में विजय आनंद उर्फ गोल्डी ने एक नई हवा का झोंका ला दिया। जब नायक खेतों में मेहनत करते दिखते थे, गोल्डी ने ‘ट्वीड जैकेट’ और सिगार वाले शहरी नायक को जन्म दिया। उनकी ‘गाइड’ (1965) ने परंपराओं को चुनौती दी—रोज़ी ने वैवाहिक जकड़नों को ठुकराकर नृत्य चुना, राजू गाइड अवसरवादी से संत बना।
यह फिल्म लालच, प्रेम और मोक्ष की गहन पड़ताल थी। गोल्डी की 23 साल की उम्र में बनी ‘नौ दो ग्यारह’ ने इंडस्ट्री हिला दी। ‘ज्वेल थीफ’ में हिचकॉक जैसा सस्पेंस, ‘छठी उंगली’ का दृश्य आज भी यादगार।
वे खुद एडिटिंग करते, गाने कहानी आगे बढ़ाते। ‘ओ हसीना जुल्फों वाली’ या कुतुब मीनार पर ‘दिल का भंवर’—संगीत को उन्होंने टूल बना दिया। ओशो प्रभाव में भांजी सुषमा से विवाह ने विवाद खड़ा किया, पर खुशहाल जीवन जिया।
अभिनय में भी कमाल—’कोरा कागज’, ‘तहकीकात’ के डिटेक्टिव सैम। 2004 में हार्ट अटैक से 70 की उम्र में निधन, सर्जरी ठुकराई। फिल्मफेयर, बीएफजेए पुरस्कार उनकी विरासत। गोल्डी ने बॉलीवुड को आधुनिक बनाया।