
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में गोपाल कृष्ण गोखले का नाम अमर है। 1866 में रत्नागिरी में जन्मे इस गणित प्रोफेसर ने राजनीति को विज्ञान की तरह सटीक बनाया। इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में उनके आंकड़ों ने ब्रिटिश अधिकारियों को पसीना छुड़ा दिया। लॉर्ड कर्जन जैसे घमंडी शासक भी उनकी तर्कशक्ति के आगे नतमस्तक हो गए।
गोखले ने नमक कर की क्रूरता उजागर की, जो गरीबों का जीवन छीन रहा था। उन्होंने सेना के फिजूलखर्ची पर प्रहार किया और शिक्षा पर धन लगाने की मांग की।
1915 में जब गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटे, गोखले ने सलाह दी- एक साल आंखें खुली, मुंह बंद रखो। इस मंत्र ने गांधी को भारत की वास्तविकता समझाई।
राजनीति को तपस्या मानते हुए गोखले ने 1905 में सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी बनाई। सदस्यों ने सात कठोर प्रतिज्ञाएं लीं- आजीवन गरीबी, देशभक्ति और पारिवारिक धन संचय न करना।
हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक गोखले को जिन्ना अपना आदर्श मानते थे। तिलक ने उनकी मृत्यु पर कहा- भारत ने हीरा खो दिया। उनका राजनीतिक वसीयतनामा स्वशासन का खाका था, जो आगे के सुधारों की आधारशिला बना। 15 फरवरी 1915 को उनका निधन हुआ, ठीक गांधी के लौटने के एक महीने बाद।