
भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम दौर की एक चमकती सितारा थीं नलिनी जयवंत। 18 फरवरी 1926 को मुंबई में जन्मीं यह अभिनेत्री न केवल अपनी खूबसूरती से लाखों दिल जीत चुकी थीं, बल्कि अपनी बहुमुखी प्रतिभा से सुपरस्टार का दर्जा हासिल कर लिया था। लेकिन उनकी जिंदगी की आखिरी सांसें इतनी उदास और अकेली थीं कि आज भी लोग इसे याद कर सिहर उठते हैं।
बचपन से फिल्मी दुनिया का शौक रखने वाली नलिनी को 14 साल की उम्र में एक पार्टी ने मंजिल दिखाई। फिल्ममेकर चिमनलाल देसाई ने उन्हें अपनी फिल्म ‘राधिका’ के लिए चुना। पिता की आपत्ति के बावजूद 1941 में उन्होंने डेब्यू किया और जल्द ही दिलीप कुमार, नरगिस, देव आनंद जैसे दिग्गजों के साथ स्क्रीन शेयर करने लगीं।
1948 की ‘अनोखा प्यार’ ने उनके करियर को नई उड़ान दी। ‘समाधि’, ‘संग्राम’ जैसी हिट फिल्मों ने उन्हें टॉप एक्ट्रेस बना दिया। स्विमसूट पहनकर पर्दे पर आने वाली पहली अभिनेत्री बनकर उन्होंने सुर्खियां बटोरीं। फिल्मफेयर की ब्यूटी पोल में अव्वल रहीं और 40 गानों में अपनी आवाज भी दी। लेकिन 60 के दशक में काम कम होता गया।
निजी जिंदगी में दर्द की बाढ़ आई। चिमनलाल के बेटे वीरेंद्र देसाई से शादी तीन साल में टूट गई। अशोक कुमार के साथ अफेयर की चर्चाएं रहीं। दूसरी शादी प्रभुदयाल से हुई, लेकिन 2001 में उनके निधन के बाद वह बिल्कुल अकेली रह गईं। कोई संतान नहीं थी।
2009 में उनका देहांत हुआ, लेकिन तीन दिन तक शव सड़ता रहा। रिश्तेदार के आने पर ही खुलासा हुआ। इस दर्दनाक मौत ने पूरे सिनेमा जगत को झकझोर दिया। नलिनी जयवंत की कहानी सितारों की चमक के पीछे छिपे अंधेरे को उजागर करती है।