
ब्रह्मांड के असीम विस्तार में पल्सर सबसे रोमांचक खगोलीय पिंडों में शुमार हैं। ये न्यूट्रॉन तारे इतनी तेजी से घूमते हैं कि एक सेकंड में सैकड़ों चक्कर लगा लेते हैं और अपनी चुंबकीय ध्रुवों से रेडियो तरंगें, एक्स-रे या गामा किरणें छोड़ते हैं। सोशल मीडिया पर इनकी चर्चा जोरों पर है, जबकि नासा ने इनके रहस्यों को खोलने वाली महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की हैं।
ये पल्सर विशाल तारों के सुपरनोवा विस्फोट के बाद बचे कोर से बनते हैं। सूर्य से 7 से 20 गुना भारी तारे जब फटते हैं, तो उनका कोर इतना सघन हो जाता है कि एक चम्मच सामग्री का वजन अरबों टन होता है। इनका व्यास महज 20 किलोमीटर होता है, लेकिन चुंबकीय क्षेत्र पृथ्वी से ट्रिलियन गुना शक्तिशाली होता है।
पृथ्वी से देखने पर ये लाइटहाउस की तरह चमकते नजर आते हैं। 1967 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने पहली बार इन्हें खोजा। रेडियो टेलिस्कोप के डेटा में हर 1.337 सेकंड पर संकेत मिले, जिन्हें शुरू में एलियन सिग्नल समझा गया। बाद में साबित हुआ कि ये प्राकृतिक हैं। इस खोज के लिए 1974 में नोबेल पुरस्कार मिला।
आज 2000 से अधिक पल्सर ज्ञात हैं। नासा का एनआईसीईआर मिशन, जो 2017 में आईएसएस पर पहुंचा, विशेष रूप से इनका अध्ययन करता है। यह एक्स-रे अवलोकन से लाख डिग्री गर्म सतह और आंतरिक संरचना का विश्लेषण करता है। पहला पल्सर पीएसआर बी1919+21 के 50 साल पूरे होने पर इसका अवलोकन किया गया।
प्रधान शोधकर्ता कीथ जेंड्रेउ के मुताबिक, एनआईसीईआर की सटीकता से तारों का द्रव्यमान और व्यास मापा जा सकेगा, जो न्यूक्लियर भौतिकी के मॉडल को मजबूत करेगा। पल्सर गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज और अंतरिक्ष नेविगेशन में भी सहायक हैं। ये ब्रह्मांड के चरम परिस्थितियों को समझने का माध्यम हैं।