
झारखंड के जमशेदपुर शहर में एक अनोखी परंपरा ने फिर से सुर्खियां बटोरीं। शकोसाईं इलाके में मांगे पर्व के आखिरी दिन हरमंगेया पर दो मासूम बच्चों का प्रतीकात्मक रूप से कुतिया से विवाह कराया गया। वजह थी बच्चों के मुंह में ऊपरी दांतों का पहले निकलना, जिसे स्थानीय आदिवासी समुदाय अशुभ मानता है।
हो जनजाति के लोगों के अनुसार, ऊपरी दांत पहले फूटना भविष्य में अनहोनी का संकेत है। इसे दूर करने के लिए कुत्ते से शादी का यह अनुष्ठान सदियों से चला आ रहा है। विश्वास है कि इससे दोष नष्ट हो जाता है और बच्चे का जीवन सुखी-सफल हो जाता है।
समारोह में दोनों बच्चों की बारात निकाली गई। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन पर सज-धजकर रस्में निभाई गईं। हालांकि यह केवल प्रतीकात्मक है, लेकिन आधुनिक समाज में यह अंधविश्वास का प्रतीक बन गया है।
पश्चिमी सिंहभूम के आदिवासी क्षेत्रों में यह रिवाज आम है। बुजुर्गों का मानना है कि पूर्वजों से मिली यह प्रथा बच्चों को विपत्तियों से बचाती है। इसी तरह चिड़ी दाग रस्म में मकर संक्रांति के बाद बच्चों की नाभि पर गर्म लोहे से दाग लगाकर पेट की बीमारियों से सुरक्षा दी जाती है।
शिक्षा और विज्ञान के युग में भी ये मान्यताएं बनी हुई हैं। समुदाय इन्हें अपनी संस्कृति का हिस्सा मानता है, जबकि विशेषज्ञ जागरूकता की जरूरत बताते हैं। क्या ये परंपराएं कभी समाप्त होंगी, यह समय ही बताएगा।