
हिंदी साहित्य के पल्प फिक्शन का सुनहरा दौर वेद प्रकाश शर्मा के नाम से चमकता है। 10 जून 1955 को मेरठ में जन्मे इस लेखक ने 17 फरवरी 2017 को दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी रचनाएं आज भी पाठकों के दिलों में धड़कती हैं। 170 से अधिक उपन्यासों के रचयिता शर्मा ने जासूसी-रोमांच विधा को घर-घर तक पहुंचाया।
उनकी भाषा सरल और बोलचाल वाली थी, जो हर तबके के पाठक को भाती। अखबारों की सुर्खियां और रोज की घटनाएं उनकी कलम का ईंधन बनतीं। ‘वर्दी वाला गुंडा’ जैसी कृति का जन्म भी इसी तरह हुआ। मेरठ के बेगमपुल में सैर करते हुए उन्होंने एक दारोगा को लोगों पर क्रूरता से डंडे बरसाते देखा। वर्दी में गुंडागर्दी का यह नजारा उनके दिमाग में सवाल पैदा कर गया—क्या वर्दीधारी भी गुंडा हो सकता है? 1993 में रिलीज होते ही 15 लाख प्रतियां पहले दिन बिक गईं।
‘बहू मांगे इंसाफ’, ‘साढ़े तीन घंटे’, ‘कैदी नंबर 100’, ‘कारीगर’ जैसी किताबें लाखों बिकीं। पाठक मोटी किताबें दिनों में निपटा देते, नई किताबों का इंतजार करते। कईयों ने किताबें किराए पर पढ़ीं। उनकी कहानियां हत्या, प्रेम, धोखे और सामाजिक कुरीतियों से लबरेज रहीं।
रचनाएं पन्नों से परे गईं। ‘सबसे बड़ा खिलाड़ी’ पर अक्षय कुमार की ‘खिलाड़ी’, ‘इंटरनेशनल खिलाड़ी’ का स्क्रीनप्ले शर्मा ने लिखा। ‘बहू मांगे इंसाफ’ पर 1985 में फिल्म बनी। केशव पंडित पर जी टीवी सीरीज आई। आमिर खान ने उनसे स्क्रिप्ट मांगी। मेरठ रत्न (1995) व नटराज भूषण जैसे सम्मान मिले। लंबी बीमारी के बाद 2017 में मेरठ में उनका निधन हुआ। आज भी उनकी किताबें नई पीढ़ी को रोमांचित कर रही हैं।