
पाकिस्तान में सम्मान हत्याओं का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। यह देश के लिए एक गंभीर मानवाधिकार चुनौती बन चुका है। हालिया रिपोर्ट के अनुसार, घटनाओं की संख्या भारी है, लेकिन सजा मिलने की दर न के बराबर है।
एक्सप्रेस ट्रिब्यून में छपी रिपोर्ट बताती है कि मीडिया में कभी-कभी चर्चित घटनाओं के पीछे छिपी है एक भयानक हकीकत। परिवारों के सुलह समझौते, अदालती देरी और पुलिस की लापरवाही से अपराधी बच निकलते हैं। एसएसडीओ के अध्ययन से साफ है कि कानून हैं, पर अमल नहीं हो पा रहा।
पंजाब में 225 मामले दर्ज, महज दो सजाएं। खैबर पख्तूनख्वा में 134 घटनाएं, दो दोषसिद्धि। सिंध में कई केस, कोई सजा नहीं। बलूचिस्तान के 32 मामलों में एक ही सजा। ये आंकड़े न्याय की कमी को उजागर करते हैं।
महिला कार्यकर्ता इमरान टक्कर कहते हैं, ’90 प्रतिशत पीड़ित महिलाएं हैं। मजबूत जांच और अभियोजन से सजा संभव है, बशर्त परिवार न झुके।’ वकील शब्बीर हुसैन गिगयानी पुलिस की कमजोरी पर निशाना साधते हैं। ‘रिश्तेदार गवाह बाद में पलट जाते हैं, 80 प्रतिशत आरोपी बरी।’
एसएसडीओ के सैयद कौसर अब्बास सुधारों की मांग करते हैं- पुलिस को सशक्त करें, सुनवाई तेज करें। सामाजिक रूढ़ियां इन हत्याओं को जन्म देती हैं, जहां सीमाएं लांघने वालों को हिंसा का शिकार बनाया जाता है। सख्ती से ही इस अभिशाप को रोका जा सकता है।