
तिरुवनंतपुरम में सबरीमला मंदिर प्रवेश विवाद फिर से गरमाया है। सुप्रीम कोर्ट में 2018 के ऐतिहासिक फैसले की समीक्षा सुनवाई शुरू होने से ठीक पहले पिनाराई विजयन सरकार ने सतर्कता बरतने का फैसला किया है। कानून मंत्री पी. राजीव ने स्पष्ट किया कि सरकार सभी पहलुओं पर गहन चिंतन के बाद ही अपना रुख तय करेगी।
उन्होंने कहा कि यह मुद्दा केवल हां-ना में बंधा नहीं है, बल्कि संवैधानिक जटिलताओं से भरा पड़ा है। पहले सरकार का पक्ष सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुकूल था, जिसमें आस्था और सुधार के बीच संतुलन पर जोर दिया गया था। अब मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली नौ जजों की पीठ 7 अप्रैल से सुनवाई करेगी। अदालत ने सभी पक्षकारों को 14 मार्च तक लिखित दलीलें जमा करने और 22 अप्रैल तक बहस पूरी करने का निर्देश दिया है।
सुनवाई से पहले नायर सेवा सोसाइटी (एनएसएस) और एसएनडीपी योगम जैसी प्रमुख संस्थाओं ने सरकार पर दबाव बनाया है। एनएसएस महासचिव जी. सुकुमारन नायर ने सभी आयु की महिलाओं के प्रवेश का विरोध करने और परंपराओं को बनाए रखने की मांग की। उन्होंने नामजप आंदोलन के केस वापस लेने की भी अपील की।
एसएनडीपी के वेल्लापल्ली नटेसन ने कहा कि आवश्यक सुधार तो हों, लेकिन सबरीमला की रीतियों में हस्तक्षेप न हो। सरकार को सभी पक्षों की सुननी चाहिए। 2018 के फैसले ने भगवान अयप्पा मंदिर में 10-50 वर्ष की महिलाओं पर लगे प्रतिबंध को हटा दिया था, जिससे भारी विवाद हुआ।
यह मामला आस्था, परंपरा और आधुनिकता के टकराव को उजागर करता है। लाखों भक्तों वाले इस तीर्थ पर फैसला केरल की सामाजिक संरचना को प्रभावित करेगा।