
भारत के घने जंगलों, पहाड़ों और मैदानों में एक अनोखा जीव घूमता है, जिसे भारतीय पैंगोलिन कहते हैं। प्रकृति का यह शांत पहरेदार अपने कठोर केरोटिन शल्कों से ढका होता है, जो दुनिया के एकमात्र स्तनधारी में पाए जाते हैं। ये 160-200 भूरे रंग के शल्क मिट्टी से मेल खाते हैं और जीव को पूरी तरह सुरक्षित रखते हैं।
खतरे का अहसास होते ही पैंगोलिन गेंद की तरह सिकुड़ जाता है। शेर-बाघ जैसे विकराल शिकारी भी इसे चीर नहीं पाते। इसका शरीर सिर से पूंछ तक 84-122 सेमी लंबा, पूंछ 33-47 सेमी और वजन 10-20 किलो होता है। यह एकाकी, शर्मीला, धीमा और निशाचर जीव है, जो दिन में बिलों में सोता और रात में भोजन ढूंढता है।
चींटी-दीमक के टीले, झाड़ियां और जड़ें इसके पसंदीदा इलाके हैं। सबसे रोचक है इसकी जीभ, जो शरीर से लंबी होती है और 40 सेमी तक निकल सकती है। पेल्विस के पास जुड़ी यह चिपचिपी जीभ दरारों में घुसकर चींटी, दीमक, उनके अंडे-लार्वा चिपका लेती है। कभी-कभी भृंग या कॉकरोच भी खाता है।
यह कीटभक्षी जीव पारिस्थितिकी के लिए वरदान है। लाखों कीट खाकर फसलें-जंगल बचाता है और मिट्टी हवादार बनाता है। लेकिन दुर्दांत शिकारी और शल्क तस्करी से खतरे में है। आईयूसीएन ने इसे संकटग्रस्त घोषित किया है और भारत में अनुसूची-1 में शामिल है।
संरक्षण संगठन मध्यप्रदेश वन विभाग से मिलकर अध्ययन कर रहे हैं, ताकि बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित हो। इस शांत योद्धा को बचाना हमारी जिम्मेदारी है।