
बलूचिस्तान में बलूच विद्रोहियों और पाकिस्तानी सेना के बीच तेज हो रही हिंसा ने दुनिया का ध्यान खींच लिया है। एक रिपोर्ट के अनुसार यह समस्या रातोंरात नहीं पैदा हुई, बल्कि पाक सेना की दमनकारी कार्रवाइयों और अत्याचारों से वर्षों सेคุมกำลังอยู่।
यूरेशिया रिव्यू में छपी रिपोर्ट बताती है कि यह महज क्षेत्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि पाकिस्तानी राज्य की गहरी कमजोरियों का आईना है। जब राजनीति सैन्य化 हो जाती है और फौज सिविल क्षेत्र में हस्तक्षेप करती है, तो परिणाम विनाशकारी होते हैं।
इस्लामाबाद विदेशी साजिश का रोना रोता है, लेकिन स्थानीय निवासी केंद्र की निरंकुश नीतियों को जिम्मेदार ठहराते हैं। राजनीतिक उपेक्षा, मानवाधिकार हनन और संसाधनों का शोषण ने हालात को ज्वालामुखी बना दिया।
बलूचिस्तान का विशाल मरुस्थलीय इलाका अर्थव्यवस्था में कम योगदान देता है, फिर भी इसे अवसरों की धरती कहा जाता है। चीन-पाक आर्थिक गलियारे का केंद्र होने से चीनी निवेश यहां उमड़ रहा है, साथ ही अमेरिकी पूंजी खनन में ललचाई जा रही। तांबा, सोना, कोयला, गैस के भंडार पाकिस्तान की आर्थिक कहानी का आधार हैं।
भारी सैन्य तैनाती के बावजूद स्थिरता नहीं। लगातार हमले सैन्य化 की नाकामी दिखाते हैं। भू-रणनीतिक महत्व अपार: अरब सागर का रास्ता, ईरान-अफगान सीमाएं, चीन को समुद्र से जोड़ना।
हाल में विरोध और हिंसा बढ़ी। आर्मी चीफ असीम मुनीर के फील्ड मार्शल बनने से सैन्य-नागरिक संबंध बिगड़े, रणनीतिक गतिरोध हो गया।
2019 से सुरक्षा अभियान तेज होने पर हताहत छिपाए गए। जबरन गुमशुदगी, नकली मुठभेड़, कार्यकर्ता गिरफ्तारियां बरकरार।
इस्लामाबाद इसे सुरक्षा समस्या बताता है, राजनीतिक जड़ें नकारता। मार्च, छात्र आंदोलनों पर गिरफ्तारी, मीडिया बंदी, धमकियां।
रिपोर्ट चेताती है, बलूचिस्तान पाकिस्तान के भविष्य के लिए घाव बन रहा।