
मुंबई, 15 फरवरी। 1910 की क्रिसमस रात को बंबई के अमेरिका-इंडिया पिक्चर पैलेस में दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ी थी। पर्दे पर ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ चल रही थी, जिसने सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। लेकिन भीड़ में बैठे धुंडीराज गोविंद फाल्के की नजरों में कुछ और ही तस्वीर घूम रही थी। ईसा मसीह को जीवंत होते देखकर उनके मन में ख्याल आया, ‘अगर यीशु स्क्रीन पर चल सकते हैं, तो हमारे राम-कृष्ण क्यों नहीं?’
उस रात थिएटर से निकले फाल्के अब दादा साहेब फाल्के थे, भारतीय सिनेमा के जनक। उनका जन्म 30 अप्रैल 1870 को नासिक के त्र्यंबकेश्वर में मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ। चलती-फिरती तस्वीरें बनाने की बात पर सबने उन्हें पागल ठहराया। उन्होंने मटर के पौधे से टाइम-लैप्स बनाकर साबित किया कि यह विज्ञान है।
कैमरा लाने लंदन गए, पत्नी सरस्वतीबाई के गहनों को गिरवी रखकर। 1912 में विलियमसन कैमरा लेकर लौटे। ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई, जिसमें हीरोइन का रोल अन्ना सालुंके ने निभाया। घर स्टूडियो बना, सरस्वतीबाई ने हर काम संभाला।
3 मई 1913 को कोरोनेशन सिनेमा में प्रीमियर हुआ। दर्शक भावुक हो उठे। ‘मोहिनी भस्मासुर’, ‘लंका दहन’ जैसी फिल्मों ने शोहरत दिलाई। लेकिन 1931 में ‘आलम आरा’ ने बोलती फिल्में लाईं, फाल्के पिछड़ गए। ‘गंगावतरण’ फ्लॉप हुई।
नासिक लौटे, बीमार और कंगाल। 16 फरवरी 1944 को निधन। 1969 में उनके सम्मान में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार शुरू हुआ।