
नई दिल्ली में अगले सप्ताह आयोजित होने वाले एआई इम्पैक्ट समिट से पहले रुब्रिक के चेयरमैन व सीईओ विपुल सिन्हा ने साफ कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को डराने वाली चीज की बजाय बदलाव व प्रगति का साधन माना जाए।
वॉशिंगटन से विशेष बातचीत में सिन्हा ने भारत के इस कदम को सराहा। देश अब ऊर्जा, कम्प्यूटिंग व एजेंटिक सिस्टम जैसे क्षेत्रों में एआई को जमीन पर उतार रहा है। उन्होंने जोर दिया कि एआई का असल मूल्य कारोबार व दैनिक जीवन में इसकी एकीकरण से है।
पहले के वैश्विक आयोजनों में जोखिमों पर बहस छाई रही, लेकिन दिल्ली समिट अवसरों व प्रभावों पर केंद्रित होगा। भारत के पास मजबूत तकनीकी बल व बुनियादी ढांचे में भारी निवेश है, जो उपयोगी एआई में वैश्विक नेतृत्व दिला सकता है।
सिन्हा ने स्वीकारा कि खतरे हैं, किंतु अवसर विशाल हैं। मोबाइल, इंटरनेट, डिजिटल भुगतान व पहचान प्रणालियों की तरह एआई भी ज्ञान असमानता घटाकर जीवन सरल बना सकता है।
रोजगार चिंताओं पर उन्होंने कहा कि डर अतिरंजित है। कृषि से औद्योगिक, ज्ञान युग के बाद अब अंतर्ज्ञान श्रम का दौर आएगा, जो नई नौकरियां व स्टार्टअप्स जन्म देगा। एआई मॉडल सीमित विशेषज्ञ बनाते हैं, लेकिन लागू करने हेतु लाखों इंजीनियर चाहिए।
अमेरिका मॉडल विकास में अग्रणी, चीन पीछे, भारत लागू एआई में मजबूत। सरकारी प्रयास—सेमीकंडक्टर, जीपीयू, डेटा सेंटर—सकारात्मक हैं। पब्लिक-प्राइवेट साझेदारी व टैक्स राहत भारत को एआई हब बना सकती हैं।
समिट का थीम ‘लोग, ग्रह, प्रगति’ है, जिसमें रोजगार प्रशिक्षण, ऊर्जा मांग व समावेशी विकास पर चर्चा होगी। अमेरिकी कंपनियां भारत के बाजार व आबादी से लोभित हैं। निवेश स्थानीय उत्पादन व सस्ती कीमतों पर केंद्रित।
एआई से सभी वर्ग लाभान्वित हों, ग्लोबल साउथ पिछड़े नहीं। स्वास्थ्य व शिक्षा में क्रांति संभव, यदि सुरक्षित उपयोग हो। एआई डेटा देता है, संदर्भ पत्रकारिता प्रदान करती है।
यह समिट सरकारें, टेक फर्म्स व शोधकर्ताओं को जोड़ेगा, जब दुनिया एआई नियम, ऊर्जा व प्रभाव बहस रही। भारत उपयोगी एआई का केंद्र बनने को तैयार।