
1980 के दशक में श्रीलंका की खूनी गृहयुद्ध की आग में एक भारतीय राजनयिक ने जान जोखिम में डालकर वेलुपिल्लई प्रभाकरण से गुप्त मुलाकात की। हरदीप सिंह पुरी, जो उस समय कोलंबो में भारतीय उच्चायोग में वरिष्ठ अधिकारी थे, ने जाफना के खतरनाक जंगलों में प्रवेश कर लिट्टे सरगना को भारत-श्रीलंका समझौते की जानकारी दी। यह मिशन两国 के रिश्तों को नई मजबूती देने वाला साबित हुआ।
दिल्ली के दरियागंज में 15 फरवरी 1952 को जन्मे पुरी को यह जोखिम भरा काम सौंपा गया। श्रीलंका में तमिल विद्रोह चरम पर था। प्रभाकरण पर राष्ट्रपति, पूर्व प्रधानमंत्री की हत्याओं का आरोप था। फिर भी पुरी नेवी अधिकारी बीके गुप्ता के साथ जंगलों से गुजरते हुए पहुंचे। लैंडमाइंस और हमलों का खतरा मंडराता रहा।
लिट्टे कार्यकर्ताओं ने पहले इनकार किया, फिर अंधेरे में घुमाते हुए प्रभाकरण तक ले गए। पुरी ने दिल्ली आने का न्योता दिया। एक लिट्टे सदस्य बोला, ‘आप हमारा राष्ट्रीय खजाना ले जा रहे हो।’ पुरी ने वादा किया कि बातचीत का नतीजा जो भी हो, प्रभाकरण को वापस लौटाएंगे। जुलाई 1987 के समझौते के बाद यह सफल रहा।
यह घटना आईपीकेएफ की तैनाती का मार्ग प्रशस्त कर द्विपक्षीय संबंधों को स्थिरता प्रदान की। पुरी का सफर प्रेरणादायक है। हिंदू कॉलेज में एबीवीपी से छात्र राजनीति, कानून की डिग्री। 2014 में भाजपा प्रवेश, 2017 से मंत्रिमंडल में। आवास-शहरी, नागरिक उड्डयन, पेट्रोलियम मंत्री के रूप में सेवा। 2020 में यूपी से राज्यसभा। उनका यह गुप्त मिशन भारतीय कूटनीति की मिसाल है।