
पटना, 13 फरवरी। केंद्र सरकार के आधिकारिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम के सभी छह छंदों का गायन या वादन अनिवार्य करने के फैसले ने राजनीतिक हलकों में जोरदार बहस छेड़ दी है। भाजपा ने इसे देशभक्ति की मिसाल बताते हुए स्वागत किया है, जबकि जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे संगठनों ने कड़ा विरोध जताया है।
भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ ने जमीयत के रुख पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम भारत का राष्ट्रीय गीत है, जिसका गौरवशाली अतीत है। यह मातृभूमि के प्रति तपस्या और बलिदान का प्रतीक है। स्वतंत्रता संग्राम में लाखों वीरों ने इसी उद्घोष के साथ प्राण त्यागे।
चुघ ने जोर देकर कहा कि यह गीत धर्म-जाति से ऊपर उठकर राष्ट्र एकता का आधार है। लोगों को इसका सम्मान करना चाहिए, विरोध नहीं।
शिवसेना के प्रवक्ता कृष्णा हेगड़े ने कहा, वंदे मातरम का अर्थ है मां को नमन करना, भारत माता की जयकार लगाना। भारत हमें आश्रय देती है। जमीयत जैसे संगठनों को इसे धार्मिक चश्मे से नहीं देखना चाहिए।
वहीं, जमीयत के महासचिव मौलाना मोहम्मद हकीमुद्दीन कासमी ने कहा कि संविधान हर नागरिक को अपनी आस्था के अनुसार जीने का अधिकार देता है। धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ कोई छंद पढ़ने को बाध्य नहीं किया जा सकता।
यह विवाद राष्ट्रवाद और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन की परीक्षा है। आने वाले दिनों में बहस और तेज होने के आसार हैं।