
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक चौंकाने वाले बयान में स्वीकार किया है कि उनका देश अफगानिस्तान में दो दशकों से अधिक समय तक ‘भाड़े की फौज’ की तरह काम करता रहा। इस्लामाबाद में आत्मघाती हमले के बाद पाकिस्तानी असेंबली में दिए गए इस बयान ने पाकिस्तान की अफगान नीति की गहरी विफलताओं को उजागर कर दिया है।
आसिफ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि 2001 से 2023 तक पाकिस्तान का अफगान संघर्ष में शामिल होना पश्चिमी हितों की सेवा के लिए था, न कि धार्मिक या वैचारिक कारणों से। उन्होंने अमेरिकी समर्थन हासिल करने के उद्देश्य से लिए गए फैसलों पर जोर दिया। यह बयान पाकिस्तान के भीतर चल रही नीतिगत समीक्षा को दर्शाता है, जहां सुरक्षा संकट के बीच पुरानी गलतियों पर पुनर्विचार हो रहा है।
पूर्व अफगान राजदूत अजीज मारेक ने इसे जिम्मेदारी से बचने का प्रयास बताया, जबकि आर्थिक लाभ को पाकिस्तानी हस्तक्षेपों का मुख्य प्रेरक माना। आसिफ के बयान में तालिबान शासित अफगानिस्तान के प्रति नाराजगी भी साफ झलकती है। उन्होंने कहा कि काबुल अब पाकिस्तान की आतंकवाद-रोधी मांगों पर हिचक दिखा रहा है, जो पहले संवेदनशील था।
पाकिस्तान ने तालिबानों की सत्ता वापसी से अपनी पश्चिमी सीमा को सुरक्षित मानने की उम्मीद की थी, लेकिन वास्तविकता भिन्न निकली। हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय के विश्लेषक काजिम जाफरी ने इसे पाकिस्तानी मंत्री का सबसे स्पष्ट नीति असफलता स्वीकारोक्ति करार दिया। उन्होंने कहा कि यह आंतरिक विरोधाभासों को उजागर करता है—गलतियों को मानना लेकिन दोष काबुल पर डालना।
आतंकवाद की बढ़ती घटनाओं के बीच यह बयान पाकिस्तान के लिए आत्ममूल्यांकन का संकेत है, लेकिन अफगानिस्तान के लिए चिंताजनक भी। क्या यह नीतिगत बदलाव लाएगा या मात्र बयानबाजी साबित होगा, यह समय बताएगा। क्षेत्रीय संबंधों में यह एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है।