
राजस्थान के भव्य चित्तौड़गढ़ किले में प्रकृति और श्रद्धा का अनुपम संगम गोमुख कुंड महादेव है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां भक्तों का तांता लग जाता है, जहां भगवान शिव का स्वयंभू शिवलिंग प्राकृतिक जलधारा से निरंतर जलाभिषेक प्राप्त करता रहता है।
किले के पूर्वी द्वार के निकट स्थित यह पवित्र कुंड जटिल नक्काशी और प्राचीन मूर्तियों से अलंकृत है। गौमुख आकार के कई मुहानों से साफ पानी हमेशा शिवलिंग पर गिरता रहता है। पहाड़ी शिखरों से निकलने वाली इस धारा का स्रोत रहस्यमय है, जिसे कुछ लोग बेराच नदी का उद्गम मानते हैं।
घुटने भर पानी वाले कुंड में छोटी मछलियां मस्ती करती नजर आती हैं। मान्यता है कि यहां दर्शन मात्र से सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। शांत वातावरण और ऊर्जावान स्थान ध्यान के लिए सर्वोत्तम है।
कुंड की दीवारें राजपूत शिल्पकला की मिसाल हैं, जहां गायों और देवी-देवताओं की बारीक मूर्तियां उकेरी गई हैं। चट्टानों में खोदे गए इस कुंड का निर्माण आज भी पहेली बना हुआ है।
प्रतिदिन पूजन होता है, लेकिन सावन और महाशिवरात्रि पर भक्त भक्ति गीत गाते हुए शिव-पार्वती विवाहोत्सव मनाते हैं। यह स्थल आस्था का प्रतीक है।