
नई दिल्ली, 13 फरवरी। सनातन धर्म में शनि प्रदोष व्रत का अनूठा माहात्म्य है। यह हर माह कृष्ण या शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को किया जाता है, किंतु शनिवार को पड़ने पर शनि प्रदोष के नाम से विख्यात होता है। 14 फरवरी को शनिवार है और कृष्ण पक्ष त्रयोदशी प्रारंभ हो रही है।
द्वादशी शाम 4:01 बजे समाप्त होकर त्रयोदशी शुरू होगी। यह अवसर भगवान शिव और शनि देव की आराधना से दोनों की कृपा प्रदान करता है। प्रदोष व्रत मूलतः शिव को अर्पित है। मान्यता है कि प्रदोष काल में शिव-पार्वती पूजन से मनोरथ सिद्ध होते हैं तथा दुख नष्ट हो जाते हैं। शनिवार को इसका फल असीमित बढ़ जाता है क्योंकि शनि शिव के परम उपासक हैं।
शिव पूजा से शनि प्रसन्न होते हैं, उनका कोप नहीं होता। ज्योतिषियों के अनुसार, साढ़ेसाती, ढैय्या या शनि दोष से पीड़ितों के लिए सर्वोत्तम है। व्रत से धन अभाव, विलंब, विवाद, चिंता, रोग दूर होते हैं। संतान, पति आयु, स्वास्थ्य, स्थिरता व समृद्धि मिलती है।
महाशिवरात्रि से पूर्व आया यह व्रत विशेष है। प्रदोष काल में शिवलिंग पर दूध, दही, घी, शहद, जल से स्नान कराएं। बेलपत्र, धतूरा, आक पुष्प शिव को, माता पार्वती को इत्र-शृंगार चढ़ाएं।
दृक पंचांगानुसार, 14 फरवरी को पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र शाम 6:16 तक, फिर उत्तराषाढ़ा। सिद्धि योग 15 फरवरी प्रातः 3:18 तक। चंद्र धनु राशि में। सूर्योदय 7 बजे, सूर्यास्त 6:10 पर।
शुभ मुहूर्त: ब्रह्म 5:18-6:09, अभिजित 12:13-12:58, अमृत काल 1:03-2:47, विजय 2:27-3:12। अशुभ: राहुकाल 9:48-11:12, यमगंड 1:59-3:23, गुलिक 7:00-8:24। इनका ध्यान रखें।