
उर्दू शायरी के मैदान में शहरयार यानी अखलाक मुहम्मद खान का जलवा आज भी बरकरार है। 13 फरवरी को उनकी पुण्यतिथि पर हम उनकी जिंदगी के उन लम्हों को याद करते हैं, जब एक तखल्लुस ने उनके सफर को नई दिशा दी।
16 सितंबर 1936 को बरेली में पैदा हुए अखलाक का बचपन मामूली परिवार में गुजरा। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से उर्दू का बारीक ज्ञान हासिल किया। शुरुआत में अपनी असल पहचान से गजलें छपवाते, जो आमजनों की तकलीफों और रिश्तों की बारीकियां बयां करतीं।
फिर आया वो पल जब उन्होंने ‘शहरयार’ अपनाया। ये नाम उनकी शायरी को राजसी ठाठ प्रदान कर गया। कम शब्दों में गहरी फिलॉसफी समेट लेते, जिससे हर उम्र के लोग जुड़ जाते।
हिंदी सिनेमा में ‘उमराव जान’ के गीतों ने उन्हें घर-घर मशहूर किया। ‘दिल चीज क्या है’ और ‘इन आंखों की मस्ती’ आज भी गुनगुनाए जाते हैं। 2008 में साहित्य अकादमी और पद्मश्री से नवाजे गए। 2012 में अलविदा कह गए, मगर शायरी अमर है।