
वैश्विक पटल पर अमेरिका, चीन और रूस के बीच बढ़ते तनाव के बीच भारत एक मजबूत तीसरे ध्रुव के रूप में उभर रहा है। यूरोप और कनाडा के लिए भारत के साथ गठजोड़ मजबूत करने के अलावा कोई बेहतर रास्ता नहीं बचा है।
चीन से दूरी बनाने और अमेरिकी नीतियों की अनिश्चितता से बचने की जद्दोजहद में यूरोप भारत को रणनीतिक साझेदार मान रहा है। भारत के पास विशाल बाजार और उत्पादन क्षमता है, बिना चीन जैसी जटिलताओं के।
भारत न तो अमेरिका जैसा सैन्य सहयोगी है और न चीन जैसा मैन्युफैक्चरिंग हब, लेकिन बंटती अर्थव्यवस्था में वह संतुलित विकल्प दे रहा है। आईफोन जैसे उत्पाद अब भारत में बन रहे हैं, जो निवेश आकर्षित कर रहा है। कम मजदूरी, बेहतर कानून व्यवस्था, तकनीकी दक्षता और बड़ा बाजार इसकी पूंजी हैं।
कनाडा भी इसी दुविधा में है। प्रधानमंत्री मार्क कार्नी चीन से सतर्क संवाद कर रहे हैं, लेकिन भारत भविष्य का व्यावहारिक साथी हो सकता है। यूरोप-भारत व्यापार समझौता और अमेरिका के साथ फ्रेमवर्क डील नई व्यवस्था का संकेत दे रहे हैं।
लोकतंत्र भारत की सबसे बड़ी ताकत है। चुनाव, अदालतें और सिविल सोसाइटी पश्चिम से तालमेल बनाती हैं। युवा अंग्रेजीभाषी कार्यबल और बढ़ती क्रय क्षमता लंबे समय की अपील है। चुनौतियां जैसे संरक्षणवाद और नौकरशाही हैं, लेकिन लचीलापन सबसे बड़ा हथियार है। ट्रंप की नीतियां भारत को अटलांटिक पुल बना रही हैं।