
शेयर बाजार की चकाचौंध में निवेशक अक्सर चमकते रिटर्न की ओर दौड़ते हैं, लेकिन असली सफलता का राज छिपा है इक्विटी और प्रेफरेंस शेयर के सूक्ष्म अंतर को समझने में। ये दोनों ही कंपनी में हिस्सेदारी का प्रतीक हैं, मगर अधिकार, लाभ और जोखिम के लिहाज से बिल्कुल अलग। बिना समझे निवेश करने से वित्तीय सपने चूर हो सकते हैं, इसलिए इनकी गहराई से पड़ताल जरूरी है।
इक्विटी शेयर कंपनी के सच्चे मालिकाना हक का प्रतीक हैं। इन्हें खरीदने वाला निवेशक शेयरधारक सभा में वोटिंग का हकदार बनता है, बड़े फैसलों में आवाज उठा सकता है। लाभ होने पर डिविडेंड मिलता है, लेकिन ये निश्चित नहीं—कंपनी के प्रदर्शन और निदेशक मंडल पर निर्भर। सभी व्यय व कर्ज चुकाने के बाद बचा लाभ ही बांटा जाता है। यही कारण है कि इक्विटी में ऊंचे रिटर्न की उम्मीद रहती है, पर बाजार की उथल-पुथल से खतरा भी कम नहीं।
प्रेफरेंस शेयर सुरक्षा का कवच हैं। डिविडेंड वितरण में इन्हें प्राथमिकता मिलती है, निश्चित दर पर भुगतान सुनिश्चित। कंपनी बंद होने पर संपत्ति बिक्री से इक्विटी से पहले पैसा मिलता है। ज्यादातर मामलों में वोटिंग अधिकार नहीं, लेकिन स्थिर आय की गारंटी। विकास की गुंजाइश सीमित होती है।
मुख्य फर्क जोखिम-इनाम में है। लंबी अवधि के जोखिम लेने वाले निवेशक इक्विटी चुनें, जबकि स्थिरता पसंद करने वालों के लिए प्रेफरेंस सही। वित्तीय लक्ष्य और सहनशक्ति तय करे चुनाव। विविधीकरण से पोर्टफोलियो मजबूत बनेगा, बाजार की पाठशाला में सफलता मिलेगी।