
राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा ने जोरदार तरीके से ‘राइट टू रिकॉल’ की मांग उठाई। उन्होंने चुने हुए प्रतिनिधियों को कार्यकाल से पहले हटाने का अधिकार जनता को देने पर बल दिया। चड्ढा ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में सांसदों-विधायकों की जवाबदेही का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है, जो लोकतंत्र के लिए घातक है।
चुनाव पूर्व नेता जनता के पीछे भागते हैं, लेकिन जीतते ही जनता उनके पीछे। आज की तीव्र गति वाली दुनिया में पांच साल इंतजार करना अपराध है। गलत चयन से लाखों लोगों का भविष्य दांव पर लग जाता है।
उन्होंने कनाडा व स्विट्जरलैंड जैसे 24 से अधिक देशों का जिक्र किया जहां यह प्रथा प्रचलित है। 2003 में अमेरिका के कैलिफोर्निया में गवर्नर ग्रे डेविस को ऊर्जा संकट व बजट गड़बड़ी पर 13 लाख हस्ताक्षरों के बाद 55 फीसदी वोटों से हटाया गया।
चड्ढा ने सवाल उठाया कि राष्ट्रपति महाभियोग, जजों की बर्खास्तगी जैसी प्रक्रियाएं हैं तो जनप्रतिनिधियों के लिए क्यों नहीं? कर्नाटक, मध्य प्रदेश आदि में पंचायत स्तर पर यह व्यवस्था मौजूद है।
दुरुपयोग रोकने के उपाय सुझाए: 18 माह बाद प्रक्रिया शुरू, स्पष्ट आधार व 50 प्रतिशत सहमति। इससे दल बेहतर प्रत्याशी उतारेंगे, निकम्मे नेता बाहर होंगे और लोकतंत्र सशक्त बनेगा।