
काशी नगरी में भगवान शिव के असंख्य रूप विराजमान हैं, लेकिन कृतिवासेश्वर महादेव का स्थान अनूठा है। आलमगीर मस्जिद के पीछे स्थित यह प्राचीन शिवलिंग खुले आकाश के नीचे पूजा जाता है, क्योंकि मंदिर का पूरा स्वरूप अभी भी विवादों में उलझा हुआ है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां पहुंचने वाले भक्तों को विशेष फल की प्राप्ति होती है, पर संख्या बहुत कम रहती है।
स्कंद पुराण की कथा के अनुसार, गजासुर नामक राक्षस ने ब्रह्मा की कठोर तपस्या से अपार सामर्थ्य अर्जित किया और तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया। काशी पर उसके अत्याचार असहनीय हो गए। तब शिव स्वयं अवतरित हुए, भयंकर संग्राम के बाद त्रिशूल से उसे भेद दिया। गजासुर की विनती पर शिव ने उसके चर्म को धारण कर लिया, जिससे कृतिवासेश्वर लिंग का उदय हुआ।
काशी के 14 भयंकर शिवलिंगों में शुमार यह मंदिर शिव के शीर्ष का प्रतीक है। आक्रमणों ने मूल लिंग को क्षतिग्रस्त किया, लेकिन भक्तों ने नया प्रतिष्ठित कर पूजा का क्रम जारी रखा। अदालत में लंबित मामला पहुंच मुश्किल बनाता है।
सावन-शिवरात्रि पर भव्य श्रृंगार देखने लायक होता है। भक्त बताते हैं कि यहां मुरादें पूरी होती हैं। इस महाशिवरात्रि पर यदि संभव हो, तो इस शक्तिशाली धाम का दर्शन करें, जहां आस्था और इतिहास का अनोखा संगम है।