
गुजरात के कच्छ जिले में स्थित छारी-ढंढ कंजर्वेशन रिजर्व को अब रामसर साइट का सम्मानजनक दर्जा प्राप्त हो गया है। यह आर्द्रभूमि 283 से अधिक पक्षी प्रजातियों का घर है, लेकिन दुर्लभ प्रवासी ग्रे हाइपोकोलियस यहां का सबसे बड़ा आकर्षण बन चुका है। गुजराती में ‘मस्कती लटोरो’ के नाम से मशहूर यह पतला काया वाला पक्षी इराक, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के शुष्क इलाकों से प्रजनन के बाद 1990 से कच्छ की इस वेटलैंड में सर्दियां बिताने आता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि ग्रे हाइपोकोलियस झाड़ीदार रेगिस्तानी क्षेत्रों, रण भूमि और आसपास के खेतों में छोटे झुंडों में भटकता है। पिलुडी के ‘पीलु’ फल और टांकरा के बेर इसका प्रिय भोजन हैं। फुलाय गांव के जंगलों में अक्टूबर-नवंबर से मार्च-अप्रैल तक इसे निहारने विश्वभर से पक्षी प्रेमी उमड़ आते हैं। 1960 में बड़े रण के कुआर बेट से इसके नमूने मिले थे, जबकि 1990 में एस.एन. वरु ने फुलाय में मादा पक्षी देखा, जो महत्वपूर्ण पुनराविष्कार था।
यह स्थल ग्रे हाइपोकोलियस दर्शन के लिए सबसे विश्वसनीय जगह है, जो पर्यटकों, फोटोग्राफरों और शोधकर्ताओं को खींचता है। इसके अलावा व्हाइट-नेप्ड टिट भी यहां प्रमुखता से दिखता है, जो मुख्यतः भारत और कच्छ में पाया जाता है। रामसर मान्यता से संरक्षण मजबूत होगा, पर्यावरण पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और ये पक्षी सुरक्षित रहेंगे।