
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तैयारी में मुर्शिदाबाद जिले की भरतपुर सीट फिर से सुर्खियों में है। इसका रोचक इतिहास, बदलते वोटर समीकरण, बांग्लादेश सीमा की निकटता और ताजा सियासी उलटफेर इसे राज्य की सबसे चर्चित सीट बनाते हैं।
बरहामपुर लोकसभा क्षेत्र के अधीन यह पूरी तरह ग्रामीण इलाका है, जहां 92 प्रतिशत से अधिक मतदाता गांवों में रहते हैं। भागीरथी नदी की जलोढ़ भूमि पर धान, जूट और सब्जियों की खेती मुख्य आजीविका है। सड़कें बहरामपुर, कृष्णानगर और कोलकाता से जोड़ती हैं, जबकि रेल बेलडांगा-बहरामपुर से।
‘भरत का नगर’ कहलाने वाला यह क्षेत्र प्राचीन हिंदू परंपराओं से जुड़ा है, लेकिन अब मुस्लिम बहुल हो चुका है। सीमापार आंदोलन ने जनसांख्यिकी बदल दी है।
1951 से आरएसपी ने 9, कांग्रेस ने 6, सीपीआई(एम) ने 1 और टीएमसी ने 1 जीत हासिल की। ईद मोहम्मद के 1991-2011 के पांच कार्यकाल और सत्यपदा भट्टाचार्य के चार ने दबदबा कायम रखा। 2011 के बाद त्रिकोणीय संघर्ष: आरएसपी की हार-जीत, 2016 में कांग्रेस की जीत, 2021 में हुमायूं कबीर की सफलता।
मुस्लिम वोटरों की बढ़ोतरी भाजपा के लिए चुनौती। टीएमसी ने कबीर को विवादों में निलंबित किया। कांग्रेस मुस्लिम आधार मजबूत करने और नाराज वोटरों को ललचाने में जुटी है। वाम-कांग्रेस-टीएमसी का पुराना प्रभाव इसे खास बनाता है। सीमावर्ती संवेदनशीलता के साथ भरतपुर चुनावी रणनीतियों का केंद्र बनेगा।