
वॉशिंगटन। बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर बढ़ते अत्याचारों ने विश्व पटल पर चिंता की लहर दौड़ा दी है। चुनावी तारीखों के ऐलान के बाद से हिंसा का सिलसिला तेज हो गया है। हिंदू और बहुधर्मी संगठनों का वैश्विक गठबंधन अब तत्काल अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की मांग कर रहा है।
हिंदूपैक्ट की पहल हिंदूज एडवांसिंग ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव (एचएएचआरआई) ने 15 देशों के 125 से अधिक संगठनों और व्यक्तियों के हस्ताक्षर वाले पत्र के जरिए अलार्म बजाया है। पत्र में हिंसा, धमकियों और जबरन विस्थापन के निरंतर पैटर्न का जिक्र है।
एचएएचआरआई के कार्यकारी निदेशक राहुल सुर ने कहा, ‘बांग्लादेश के हिंदू देश के मूल निवासी हैं। 2007 के यूएन स्वदेशी लोगों के अधिकार सम्मेलन के तहत उन्हें भेदभावरहित जीवन और संस्कृति का अधिकार है। लेकिन वास्तविकता उलटी है – यह कोई छिटपुट घटना नहीं, बल्कि दंड-मुक्ति पर आधारित मानवाधिकार संकट है।’
पत्र में हत्याओं, भीड़ हिंसा, मंदिर-घरों पर हमलों और ईशनिंदा के झूठे आरोपों का विवरण है। 18 दिसंबर 2024 को दीपू चंद्र दास की खुलेआम हत्या इसका ज्वलंत उदाहरण है, जिसका वीडियो वायरल हो गया।
अगस्त 2024 से 30 नवंबर तक अल्पसंख्यकों पर 2,673 हमले दर्ज हुए। पिछली सरकार गिरने के बाद हिंदू समुदाय में भय व्याप्त है। 1951 में 22% से घटकर अब हिंदू आबादी 7% से कम रह गई, हर साल 2.3 लाख हिंदू देश छोड़ रहे हैं।
हिंदूपैक्ट के संस्थापक अजय शाह ने कहा, ‘ये आंकड़े भयावह कहानी कहते हैं। लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों की रक्षा चुनिंदा नहीं हो सकती। यह सरकारी और वैश्विक प्रणाली की विफलता है।’
गठबंधन ने अमेरिका से फैक्ट-फाइंडिंग टीम, व्यापारिक दंड, शरणार्थी संरक्षण और यूएन शांति मिशन समीक्षा की मांग की। यूरोपीय संघ से दंडात्मक टैरिफ और जांच, संयुक्त राष्ट्र से निंदा व स्वतंत्र जांच।
25 से अधिक अमेरिकी शहरों में रैलियां हुईं, यूएन मानवाधिकार आयुक्त को हजारों हस्ताक्षरों वाली याचिका सौंपी गई। सुर बोले, ‘रैलियां और याचिकाएं बताती हैं कि यह नीतिगत मुद्दा नहीं, सभी धर्मों के नागरिकों की पुकार है।’
यह मुद्दा पहले भी यूएन, अमेरिकी कांग्रेस और भारत-अमेरिका मंचों पर उठा है। अब ठोस कदमों की बारी है।