
नई दिल्ली, 9 फरवरी। 10 फरवरी वह तारीख है जब हिंदी कविता की धमाकेदार आवाज ‘धूमिल’ यानी सुदामा पांडेय हमसे हमेशा के लिए दूर हो गए। महज 39 साल की उम्र में ब्रेन ट्यूमर ने उन्हें छीन लिया, लेकिन उनके छोटे से जीवन ने साठोत्तरी कविता को जो विद्रोही जोश, सड़क की भाषा और गहरी नजर दी, वह आज भी बेमिसाल है।
नई कविता से अकविता की ओर बढ़ते दौर में धूमिल जैसे मजदूर-किसान कवि उतरे, जिनकी रचनाएं सत्ता, राजनीति और समाज की जड़ों को हिला देती थीं। वे कहते थे- शब्द साथियों के लिए, शस्त्र दुश्मनों के लिए। उनका गुस्सा पूरी पीढ़ी का था, शोषण के खिलाफ तड़प।
उनकी मशहूर पंक्तियां याद कीजिए- ‘एक आदमी रोटी बेलता है, एक खाता है, तीसरा न बेलता न खाता, बस रोटी से खेलता है। यह तीसरा कौन? संसद चुप है।’ जन्म 9 नवंबर 1936, वाराणसी के गांव में किसान परिवार। 13 साल में शादी, पिता की मौत के बाद मजदूरी, कोलकाता के कारखाने, फिर इलेक्ट्रीशियन प्रशिक्षक।
नक्सलबाड़ी और सामाजिक उथल-पुथल ने उनकी कविता को जमीनी बनाया। भाषा सरल, बोलचाल की, बिंब तीखे। आजादी के बाद के मोहभंग को उन्होंने बेनकाब किया। एक संग्रह जीवनकाल में- ‘संसद से सड़क तक’। बाद में ‘कल सुनना मुझे’ को साहित्य अकादमी सम्मान।
धूमिल ने कविता को किताबों से निकालकर जिंदगी की जंग में उतारा। आज भी असमानता और सत्ता के खेल पर उनकी कविता चुभती है।
