
हिंदी सिनेमा में खाकी वर्दी पहनकर न्याय का प्रतीक बने अभिनेता सुजीत कुमार का नाम हर कोई जानता है। उनके पुलिस वाले किरदारों ने दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी। उत्तर प्रदेश के एक साधारण किसान परिवार से निकले इस कलाकार ने कानून की पढ़ाई छोड़कर फिल्म जगत में कदम रखा और अमर हो गए।
7 फरवरी 1934 को वाराणसी के चकिया में शमशेर बहादुर सिंह के रूप में जन्मे सुजीत शुरू से ही मेधावी थे। लॉ की डिग्री हासिल करने के चक्कर में थे, लेकिन कॉलेज के एक नाटक ने उनकी किस्मत बदल दी। मशहूर निर्देशक फणी मजूमदार ने उनकी दमदार आवाज सुनी और मुंबई बुला लिया।
1954 में ‘टैक्सी ड्राइवर’ से डेब्यू किया। छोटे-मोटे रोल्स से शुरुआत हुई—दोस्त, खलनायक, रहस्यमयी चरित्र। 60-70 के दशक में थ्रिलर फिल्मों ने उन्हें पहचान दी, लेकिन पुलिस इंस्पेक्टर बनते ही छा गए।
‘इत्तेफाक’ का तेज तर्रार अफसर हो या ‘अमीरी गरीबी’, ‘द बर्निंग ट्रेन’, ‘टक्कर’, ‘बॉक्सर’, ‘कैदी’, ‘हकीकत’, ‘काला धंधा गोरे लोग’, ‘तिरंगा’, ‘क्रांतिवीर’ के सख्त अधिकारी—हर भूमिका यादगार। हिंदी फिल्मों में सबसे ज्यादा पुलिस रोल उनके नाम।
भोजपुरी सिनेमा के पहले सुपरस्टार बने। ‘गंगा मइया तोहे पियरी’, ‘बिदेसिया’, ‘दंगल’, ‘पान खाए सइंया हमार’ ने पूर्वी भारत में धूम मचाई।
पत्नी किरण सिंह संग निर्माता बने, ‘खेल’, ‘दरार’, ‘चैंपियन’ बनाईं। भोजपुरी में लाइफटाइम अवॉर्ड मिला। कैंसर से जंग लड़ते 5 फरवरी 2010 को 76 साल की उम्र में चल बसे। उनका योगदान आज भी प्रेरणा देता है।