
उज्जैन की पावन शिप्रा नदी के किनारे बसा महाकालेश्वर मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में सर्वश्रेष्ठ दक्षिणमुखी स्वयंभू शिवालय है। यहां भक्तों को बाबा महाकाल के एक दर्शन से जीवनसफर बदल जाता है, किंतु मंदिर परिसर में छिपा एक रहस्यमयी तथ्य बहुत कम लोगों को ज्ञात है। मुख्य गर्भगृह के शिवलिंग से भी प्राचीन वृद्धकालेश्वर महादेव का शिवलिंग स्थित है, जिसके बिना महाकाल यात्रा अपूर्ण मानी जाती है।
महाकाल मंदिर में प्रवेश से पूर्व वृद्धकालेश्वर मंदिर आता है, जो मुख्य मंदिर से कहीं अधिक पुरातन है। यहां प्रतिष्ठित शिवलिंग बाबा महाकाल के समान आकार का है और प्रतिदिन वैसा ही शृंगार व पूजा होती है। मान्यता है कि वृद्धकालेश्वर महाकाल के वृद्ध अवतार हैं, जो धरती पर उनसे पूर्व अवतरित हुए।
आक्रमणकारियों ने इस शिवलिंग व मंदिर को नष्ट करने का प्रयास किया, जिसके चिह्न आज भी जर्जर दीवारों पर दिखते हैं। फिर भी नियमित संरक्षण से यह अपनी जगह कायम रखे हुए है। महाकाल के स्पर्श दर्शन दुर्लभ हैं, किंतु वृद्धकालेश्वर के दर्शन के द्वार सदा खुले रहते हैं।
सावन व महाशिवरात्रि पर भक्त विशेष पूजाएं कर मनोकामनाएं पूरी कराते हैं। दैनिक आरतियां भी मुख्य मंदिर जैसी ही होती हैं। सच्चे भक्त महाकाल दर्शन उपरांत यहां अवश्य आते हैं, तभी यात्रा का पूण्य प्राप्त होता है।
उज्जैन का यह प्राचीन शिवालय भक्तों की आस्थाओं को साकार कर रहा है, जो सिद्ध करता है कि सच्ची भक्ति गहन खोज से ही फलित होती है।