
भारत रत्न लता मंगेशकर की पुण्यतिथि पर उनकी भोजपुरी गायकी हमेशा याद आती है। स्वर कोकिला ने हिंदी-मराठी के अलावा भोजपुरी फिल्मों को भी अपनी अमृत वाणी से नवाजा। 1960 के दशक में उनके गीतों ने इस क्षेत्रीय सिनेमा को नई ऊंचाइयां दीं, जहां भक्ति, प्रेम और ग्रामीण जीवन की झलक मिलती है।
‘हे गंगा मइया तोहे पियरी चड़इबो’ भोजपुरी की पहली फिल्म का शीर्षक गीत था। कुंदन कुमार के निर्देशन में बनी इस 1963 की फिल्म में कुमकुम-असीम कुमार की जोड़ी ने कमाल किया। विधवा पुनर्विवाह की भावुक कहानी में लता जी की प्रार्थना ने गीत को भोजपुरी संस्कृति का अभिन्न अंग बना दिया। चित्रगुप्त का संगीत और शैलेंद्र के बोल इसे अविस्मरणीय बनाते हैं।
प्रेमी जोड़े की मस्ती भरा ‘लुक छिप बदरा में’ भी इसी फिल्म से है। बादलों की ओट में छुप-छुपाई का रोमांस लता की मधुरता से चरम पर पहुंचा। इस गाने ने फिल्म की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
‘लाली लाली होठवा से बरसे ललईया’ फिल्म ‘लागी नहीं छूटे राम’ का सदाबहार रोमांटिक नंबर है। प्रेम और समर्पण की यह कहानी लता जी की आवाज में अमर हो गई। चित्रगुप्त के संगीत ने इसे सुपरहिट बनाया।
‘उमरिया कइली तोहरे नाम’ उनके भोजपुरी सफर का पहला पड़ाव माना जाता है। जीवन समर्पण की यह भावुक धुन आज भी दिल छू लेती है। लता मंगेशकर ने भोजपुरी संगीत को समृद्ध कर एक अनमोल योगदान दिया, जो पीढ़ियों तक गूंजेगा।