
सुप्रीम कोर्ट ने जन सुराज पार्टी की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें बिहार विधानसभा चुनाव को रद्द कर दोबारा मतदान कराने की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सख्त लहजे में पार्टी से सवाल किया कि आपकी पार्टी को कुल कितने वोट पड़े? जनता ने आपको ठुकरा दिया और अब आप लोकप्रियता के लिए न्यायालय का सहारा ले रहे हैं।
जन सुराज पार्टी ने अपनी याचिका में चुनाव में बड़े पैमाने पर धांधली, बूथ कैप्चरिंग, नकली वोटिंग और प्रशासनिक पक्षपात का आरोप लगाया था। पार्टी का दावा था कि एनडीए गठबंधन ने सरकारी तंत्र का दुरुपयोग कर परिणाम अपने पक्ष में कराए। लेकिन शीर्ष अदालत ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि कोर्ट हर चुनाव विवाद में हस्तक्षेप नहीं कर सकता, खासकर जब याचिकाकर्ता को न्यूनतम जन समर्थन भी न मिला हो।
प्रशांत किशोर ने इस साल फरवरी में जन सुराज की स्थापना की थी। उन्होंने बिहार की सत्ताधारी पार्टियों पर भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और पलायन जैसे मुद्दों पर जोरदार हमला बोला। लेकिन चुनावी मैदान में उनकी पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। न कोई सीट जीती, न ही उल्लेखनीय वोट शेयर हासिल हुआ।
न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में जनादेश सर्वोपरि है। निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन व्यवस्था पर सवाल उठाने से पहले ठोस सबूत पेश करने चाहिए। यह फैसला बिहार की नई सरकार के लिए राहत है, जो नीतीश कुमार के नेतृत्व में अपनी योजनाओं को लागू करने पर केंद्रित हो सकेगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर को अब अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा। स्थानीय निकाय चुनावों या भविष्य के विधानसभा चुनावों में मजबूत आधार तैयार करना होगा। अन्यथा जन सुराज केवल एक राजनीतिक प्रयोग बनकर रह जाएगी। बिहार की राजनीति में नई ताकत बनने की राह कठिन है, जहां जाति और गठबंधन ही निर्णायक होते हैं।
यह घटना न्यायपालिका की स्वतंत्र भूमिका को रेखांकित करती है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की रक्षा करती है।