
वॉशिंगटन। अमेरिका के प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी के तौर पर पाकिस्तान की विश्वसनीयता पर ईरान के प्रति उसके अटल समर्थन ने गहरा सवाल खड़ा कर दिया है। एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि तेहरान के साथ पाकिस्तान के गहरे रिश्ते इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर निष्पक्ष भूमिका निभाने के अयोग्य बनाते हैं।
मिडिल ईस्ट मीडिया रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान को अमेरिका-नेतृत्व वाले ‘बोर्ड ऑफ पीस’ से दूर रखा जाए, जिसकी स्थापना 15 जनवरी 2026 को हुई। राष्ट्रपति ट्रंप ने 18 जनवरी को पाक पीएम शहबाज शरीफ को न्योता दिया था। लेकिन 6 फरवरी को तुर्की में ईरान-अमेरिका वार्ता में उसकी सहायक भूमिका पर सवाल उठे हैं।
रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने 13 जनवरी को ईरान को ‘प्रिय पड़ोसी’ बताते हुए उसकी सुरक्षा को पाकिस्तान के लिए जरूरी ठहराया। 20 जनवरी को ईरानी राजदूत से मुलाकात में उन्होंने हर हाल में साथ खड़े रहने का भरोसा दिलाया। संयुक्त राष्ट्र में ईरान प्रदर्शनों पर जांच बढ़ाने के प्रस्ताव के खिलाफ पाकिस्तान का वोट भी इसी कड़ी का हिस्सा है, जिसका 24 जनवरी को ईरानी विदेश मंत्री ने आभार माना।
जून 2025 के 12 दिवसीय युद्ध में पाकिस्तान ने ईरान का खुला साथ दिया, जब अमेरिकी हमलों ने उसके परमाणु केंद्रों को निशाना बनाया। युद्ध बाद ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन की 2-3 अगस्त 2025 की पाक यात्रा ने रिश्तों को मजबूत किया, दोनों पक्षों ने व्यापार वृद्धि की महत्वाकांक्षाएं साझा कीं।
रिपोर्ट सिफारिश करती है कि पाकिस्तान का एमएनएनए दर्जा रद्द हो और सैन्य सहायता पर पाबंदी लगे। यह पाकिस्तान के दोहरे चरित्र को उजागर करता है, जो अमेरिकी हितों के खिलाफ जाता है। मध्य पूर्व की उलझी राजनीति में यह बदलाव क्षेत्रीय समीकरणों को नया मोड़ दे सकता है।