
नई दिल्ली में राजनीतिक गर्मी चरम पर है। भाजपा के राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने नेता सदन जेपी नड्डा के ‘अबोध बालक’ वाले बयान का पूरा समर्थन करते हुए कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर जोरदार हमला बोला। सोशल मीडिया एक्स पर त्रिवेदी ने कहा कि ‘अबोध’ शब्द ‘बोध’ में ‘अ’ प्रत्यय जोड़कर बना है, यानी जिसे ज्ञान का लेश भी न हो। वैसे तो ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती और अज्ञान की कोई उम्र भी निर्धारित नहीं है। यह विपक्ष के नेता के आचरण से स्पष्ट सिद्ध होता है।
त्रिवेदी ने सदन की कार्यवाही के नियमों पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सदन में कोई सभापति मीडिया रिपोर्ट्स को सब्सटेंशियल एविडेंस नहीं मान सकता। केवल पटल पर रखे गए आधिकारिक दस्तावेज ही प्रमाणिक होते हैं। सेना प्रमुख, प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री के बीच संवाद राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से अति गोपनीय है। यह ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट 1923 के दायरे में आता है, इसलिए सार्वजनिक चर्चा के लिए उपलब्ध नहीं हो सकता।
ऐतिहासिक तथ्यों का हवाला देते हुए त्रिवेदी ने 19 नवंबर 1962 का जिक्र किया जब जवाहरलाल नेहरू ने अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी को पत्र लिखा। इसमें बी-52 बॉम्बर, स्क्वाड्रन, पायलट, तकनीकी स्टाफ और रडार ऑपरेटरों की मांग की गई – मतलब भारत की वायुसेना की कमान अमेरिकियों को सौंपना। यह पत्र 2010 में जेएफके लाइब्रेरी द्वारा डीक्लासिफाई किया गया।
नेहरू के भतीजे और तत्कालीन राजदूत बीके नेहरू ने अपनी किताब ‘नाइस गाइज फिनिश सेकंड’ में लिखा कि पत्र सौंपते समय उन्हें इतनी शर्मिंदगी हुई कि आंसू रोक न सके। त्रिवेदी ने इसे ‘चाचाजी के अपमानजनक सरेंडर की सगे भतीजे की जुबानी’ कहकर चुटकी ली। गुरुवार को राज्यसभा में नड्डा के बयान से मल्लिकार्जुन खड़गे भड़क गए थे। त्रिवेदी का यह प्रहार विपक्ष को और चुनौती दे रहा है।