
आयुर्वेद की विद्या में वात, पित्त और कफ तीनों दोषों का संतुलन शरीर की सेहत का आधार है। वात दोष वायु और आकाश तत्व से जुड़ा होने के कारण गति, संचार और तंत्रिकाओं को नियंत्रित करता है। इसका असंतुलन रूखापन, चिंता, जोड़ों का दर्द और अपच जैसी समस्याएं पैदा करता है। इन आसान तरीकों से इसे नियंत्रित करें।
सबसे पहले स्नेहन अपनाएं। तिल का तेल गर्म प्रकृति का होता है जो वात को शांत करता है। भोजन में मिलाकर या अकेले एक चम्मच रोज लें। इससे आंतरिक शुष्कता दूर होती है और ऊर्जा स्थिर रहती है।
अभ्यंगन से त्वचा और बालों को पोषण दें। वात बढ़ने पर शरीर रूखा हो जाता है। गर्म तेल से सिर, तलवों और कानों के पीछे मालिश करें। यह नसों को मजबूत बनाता है और नींद में सुधार लाता है। 10 मिनट रोजाना पर्याप्त है।
स्वेदन से पसीना निकालें। व्यायाम, योग या भाप से विषाक्त पदार्थ बाहर निकलते हैं। इससे वात का प्रवाह सुचारू होता है और थकान भाग जाती है। हल्की गतिविधियां जैसे सूर्य नमस्कार आदर्श हैं।
आहार में खट्टा, मीठा और नमकीन रस शामिल करें। गर्म दालें, जड़ वाली सब्जियां, घी युक्त भोजन लें। ठंडा या कच्चा भोजन न खाएं। इससे पाचन मजबूत होता है और वात नियंत्रित रहता है।
वेष्टन से दर्द निवारण करें। जोड़ों पर गर्म पट्टियां बांधें। यह सूजन कम करता है और वात को स्थिर बनाता है। इन उपायों को जीवनशैली में अपनाकर स्वस्थ और सक्रिय रहें।