
मणिपुर की जूडो सनसनी सुशीला देवी लिकमाबम का जीवन संघर्ष और सफलता की मिसाल है। 1 फरवरी 1995 को इंफाल के हेइंगांग मायई लीकाई में जन्मीं सुशीला ने मात्र सात साल की उम्र में अपने चाचा लिकमाबम दीनीत के मार्गदर्शन में जूडो की शुरुआत की। 2002 में खुमान लैम्पक ले जाया गया, जहां से उनकी यात्रा शुरू हुई।
2007 से 2010 तक मणिपुर SAI में और फिर पटियाला में ट्रेनिंग। शुरुआती दिनों में आर्थिक तंगी ने कष्ट दिया। पिता की निजी नौकरी से यात्रा और डाइट का खर्च न उठ पाता। प्रतियोगिताओं के लिए पैसे जुटाने पड़ते, लेकिन हार न मानी। SAI हॉस्टल, स्पॉन्सरशिप और स्कॉलरशिप ने राहत दी।
2014 ग्लासगो कॉमनवेल्थ गेम्स में 48 किग्रा में रजत। 2019 साउथ एशियन गेम्स में स्वर्ण। 2018-19 हांगकांग एशिया ओपन में रजत। टोक्यो ओलंपिक 2020 में भारत की एकमात्र जूडोका। 2022 कॉमनवेल्थ में फिर रजत।
भविष्य में स्वर्ण की आशा। सुशीला की कहानी युवाओं को प्रेरित करती है कि मेहनत से हर बाधा पार की जा सकती है।