
स्वतंत्रता पूर्व का भारत, जहां महिलाओं का घर से बाहर कदम रखना भी मुश्किल था, वहां सुरैया ने हिंदी सिनेमा में धूम मचा दी। नायकों से अधिक कमाई करने वाली यह अभिनेत्री अपनी खूबसूरती और आवाज से सबको दीवाना बना दिया। उनकी पुण्यतिथि पर जानते हैं उस प्रेम कहानी का दर्द जो परंपराओं की भेंट चढ़ गई।
मात्र 12 वर्ष की आयु में मामा एम. जहांर के साथ सेट पर पहुंचीं सुरैया। ‘ताजमहल’ में युवा मुमताज का रोल मिला। एआईआर पर गाते हुए नौशाद ने उनकी प्रतिभा पहचानी और 1942 में ‘शарда’ से पार्श्व गायकी शुरू हुई। 300 से अधिक गीत गाकर उन्होंने ‘मलिका-ए-तरन्नुम’ का खिताब हासिल किया।
उनकी सुंदरता का ठिकाना न था। देव आनंद भी उनके कायल। सात फिल्मों में जोड़ी ने धमाल मचाया – ‘विद्या’, ‘जीत’, ‘शायर’, ‘अफसर’। सेट पर निकनेम, रोमांटिक सीनों की गहराई – दोस्ती प्यार बन गई।
लेकिन रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार ने रिश्ते का विरोध किया। नानी सेट पर आ धमकतीं, सीन कटवातीं। देव ने दोस्तों से उधार लेकर 3000 रुपए की हीरों वाली अंगूठी खरीदी, पर परिवार नहीं माना। दोनों ने इज्जत बचाने को रिश्ता तोड़ा।
आखिरी मुलाकात में घंटों रोए दोनों। सुरैया ने अंगूठी समंदर में फेंक दी। उसके बाद जीवनभर तनहा रहीं। सुरैया की कहानी समाज की कट्टरता की याद दिलाती है।