
हर साल 30 जनवरी को शहीद दिवस पर महात्मा गांधी के शांति, अहिंसा और सर्वोदय के संदेश को याद किया जाता है। उनके विचारों ने न केवल भारत को आजादी दी, बल्कि विश्व को सत्याग्रह का पाठ पढ़ाया। भारतीय सिनेमा ने इन आदर्शों को बखूबी उतारा है, जीवनीपरक से लेकर आधुनिक व्यंग्य तक विभिन्न शैलियों में।
ये फिल्में गांधीजी के सिद्धांतों को समकालीन संदर्भों से जोड़ती हैं, युवाओं को प्रेरित करती हैं कि अहिंसा आज भी हथियार है। 1982 की ‘गांधी’ से शुरू होकर 2006 की ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ तक, ये कृतियां इतिहास को जीवंत बनाती हैं।
रिचर्ड एटनबरो निर्देशित ‘गांधी’ में बेन किंग्सले ने दक्षिण अफ्रीका से स्वतंत्रता संग्राम तक की यात्रा बयां की। ऑस्कर विजेता यह फिल्म अहिंसा की ताकत दिखाती है।
फिरोज अब्बास खान की ‘गांधी मेरे पिता’ (2007) हरिलाल (अक्षय खन्ना) के नजरिए से पिता-पुत्र संघर्ष उजागर करती है।
राजकुमार हिरानी की ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ (2006) में संजय दत्त का गुंडा ‘गांडिगिरी’ से बदलता है, समाज को संदेश देता है।
कमल हासन की ‘हे राम’ (2000) बंटवारे और हत्या की पृष्ठभूमि में गांधी विचारों पर चिंतन कराती है।
जाह्नू बरुआ की ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’ (2005) में अनुपम खेर अल्जाइमर पीड़ित के रूप में सामाजिक प्रभाव दिखाते हैं।
श्याम बेनेगल की ‘महात्मा का निर्माण’ (1996) दक्षिण अफ्रीका काल पर केंद्रित है।
ये फिल्में गांधीजी के संदेश को नई पीढ़ी तक पहुंचा रही हैं, प्रासंगिकता सिद्ध करती हैं।