
वाशिंगटन। अमेरिकी सीनेट में दवाओं की आपूर्ति श्रृंखला पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। विधायकों ने मांग की है कि हर दवा पर स्पष्ट रूप से उसके निर्माण देश का उल्लेख अनिवार्य हो। विशेषज्ञ समिति की सुनवाई में सामने आया कि अमेरिका में 91 प्रतिशत जेनेरिक दवाएं इस्तेमाल होती हैं, जिनमें 94 प्रतिशत सक्रिय तत्व विदेशों से आते हैं, खासकर चीन और भारत से।
समिति अध्यक्ष रिक स्कॉट ने ‘क्लियर लेबल्स एक्ट’ विधेयक पेश किया, जो सभी प्रिस्क्रिप्शन दवाओं पर उत्पादन स्थल की जानकारी जरूरी बनाएगा। उन्होंने कहा कि कोविड-19 के दौरान भारत द्वारा निर्यात रोकने से खतरा साफ हो गया। विदेशी निर्भरता से स्वास्थ्य सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षाब दोनों जोखिम में हैं।
डॉक्टरों और मरीजों को दवा का स्रोत पता न चलना निगरानी को कठिन बनाता है। एफडीए के अलर्ट्स में कैंसरकारी अशुद्धियां और गंदे कारखाने उजागर हुए, जो बुजुर्गों को सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं। विशेषज्ञों ने क्यूआर कोड से जानकारी उपलब्ध कराने का सुझाव दिया, ताकि गुणवत्ता पर प्रतिस्पर्धा बढ़े।
ओहायो स्टेट के प्रोफेसर जॉन ग्रे ने कहा कि जेनेरिक दवाएं एक जैसी नहीं होतीं, खासकर विदेशी उत्पादन में। माइकल गैनियो ने पारदर्शिता से मूल्य युद्ध रुकने की बात कही। मिनेसोटा के स्टीफन शोंडेलमेयर ने भारत को महत्वपूर्ण लेकिन चुनौतीपूर्ण बताया। ड्यूक इंस्टीट्यूट ने सप्लाई चेन की व्यापक समस्याओं पर प्रकाश डाला।
सुनवाई का रिकॉर्ड खुला रहेगा। महामारी ने इस मुद्दे को दोनों दलों में एकजुट कर दिया है, जो दवा उत्पादन में स्वदेशीकरण की दिशा में कदम हो सकता है।