
नई दिल्ली। वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों और तकनीकी उथल-पुथल के दौर में भी भारत का मौद्रिक एवं वित्तीय क्षेत्र अप्रैल-दिसंबर 2025 (वित्त वर्ष 2026) में शानदार प्रदर्शन करता दिखा। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण ने इसकी जोरदार तस्दीक की है।
सर्वेक्षण के अनुसार, अनिश्चितताओं से निपटने के लिए नियामकीय नवाचार, पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य हैं। वैश्विक वित्त की अस्थिरता से बचाव के लिए घरेलू स्तर पर नए-नए समावेशी वित्तीय स्रोतों की जरूरत बताई गई।
मई 2025 में आरबीआई ने अपने नियामकीय ढांचे को ऐतिहासिक मान्यता दी, जो पारदर्शी, परामर्शी और प्रभावी मौद्रिक प्रबंधन पर केंद्रित है। यह ढांचा सूक्ष्म आर्थिक लक्ष्यों को सामाजिक उद्देश्यों से जोड़ता है।
मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए वित्तीय स्थिरता और समावेशी विकास को बढ़ावा देने वाली मौद्रिक नीति सतत प्रगति का आधार बनी। मुद्रास्फीति में कमी पर आरबीआई की नीति समिति ने रेपो दर व सीआरआर में कटौती की, ओएमओ से तरलता सुनिश्चित की।
इन कदमों से ऋण प्रवाह, निवेश और आर्थिक गतिविधियां तेज हुईं। वित्त वर्ष 2026 में बैंकिंग क्षेत्र में पर्याप्त तरलता बनी रही, जिससे ऋण-जमा दरें गतिशील रहीं। भारत की यह मजबूती वैश्विक संकटों के बीच आश्वासन देती है।